उत्तर प्रदेश के चुनाव में सामान्य वर्ग (जनता) विलुप्त हो गई है।



‘‘दिल्ली‘‘ की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है, राजनीति में रहने से लेकर समझने वाला प्रत्येक व्यक्ति जानता है। इसलिए पांच राज्यों के चुनाव में सबसे ज्यादा अहमियत उत्तर प्रदेश की है, जिसे 2024 के लोकसभा चुनाव के पूर्व का सेमीफाइनल भी कहा जा रहा है।            
वैसे तो उत्तर प्रदेश व बिहार देश के ऐसे राज्य हैं, जहाँ राजनीति का केंद्र बिंदु सिंद्धान्तः राष्ट्रवाद से प्रारंभ होकर अतंतः वस्तुतः धरातल पर जातिवाद पर उतर जाता है। यही दोनों प्रदेशों की राजनैतिक सच्चाई है। ‘‘सबका साथ, सबका-विकास, सबका-विश्वास और सबका-प्रयास’’ का नारा देने वाली भाजपा और बहुजन हिताय को बदल कर सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाए का मंत्र देने वाली बसपा तथा ‘‘सब आये, सबको स्थान व सबको सम्मान’’ की बात करने वाली सपा तीनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में सर्व समाज की भावना (जिसमें सामान्य वर्ग भी शामिल है) का सिद्धांत सिद्धांतः शामिल होने पर भी मेरे जैसे एक सामान्य व्यक्ति का दिल खुश होकर मन भी खिल जाता है। परन्तु पिछले तीन दिनों से उत्तर प्रदेश के गरमाते राजनीतिक पिच (पटल) पर जिस तरह की भागम-भागी, परस्पर व दूसरी पार्टीयों से पलायन का दौर दो प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों भाजपा-सपा के बीच चल रहा है और जिस तरह से उक्त पलायन के लिए कारण व जवाबी कसीदें गढ़े जा रहे है, उन्हे पढ़ कर देश की सामान्य वर्ग (जनता) की आंखें खुल जानी चाहिए।
‘‘सांझे की हंडिया चौराहे पर फोड़ने वाले’’ स्वामी प्रसाद मौर्य व उनके एक के बाद एक इस्तीफे देने वाले मंत्रियों व विधायकों की इस्तीफे देने के कारणों की भाषा जो लगभग एक सी है, पर आपका ध्यान आकर्षित कराना चाहता हूं। जब वे सब एक सुर में यह कहते नहीं थक रहे हैं कि दलितों, पिछड़ों, शोषितों, वंचितों, कुचला, कमजोर, गरीब, मजदूर वर्ग किसानों व बेरोजगार नौजवानों के साथ भाजपा नेतृत्व ने न केवल अत्याचार किया है, बल्कि वस्तुतः धोखा किया है और उनके हित में कुछ नहीं किया। वैसे स्वामी प्रसाद यह बतलाने में असफल रहे कि मंत्रिमंडल में शामिल होने के बाद उन्होंने इन वर्गो के हितों के लिये मंत्रीमंडल व पार्टी फोरम में कब-कब आवाज उठाई? और योगी सरकार ने जब कोई कार्यवाही नहीं की तब सत्ता के सुख के विकर्षण? के कारण उन्हे यह समझने में पांच साल लग गये? तब जब सत्ता का आकर्षण समाप्त हो रहा था। जबकि भाजपा उक्त आरोपों के बचाव में यह कह रही है कि हमने इन सब वर्गों के लिए जितना कार्य किया है, उतना किसी ने आज तक नहीं किया। मतलब साफ है! इस देश की 134 करोड़ जनता को इन्हीं वर्गों (उपरोक्त उल्लेखित) में विभाजित है और जिनके विकास किए जाने की बात भाजपा व समाजवादी पार्टी कर रही है। इसमें सामान्य वर्ग कहां खड़ा है? बड़ा प्रश्न यह है? यदि उपरोक्त वर्णित वर्गो का प्रतीकात्मक रूप जाति से संबंध न होकर केवल आर्थिक स्थिति से है, तो इसमें सामान्य वर्ग भी शामिल है, यह माना जायेगा। इस दृष्टि से तो स्वागत किया जाना चाहिये। अन्यथा जैसा कि कहा जाता है ‘‘घर का जोगी जोगड़ा, आन गांव का सिद्ध‘‘, विकास की दौड़ में सामान्य वर्ग को छोड़कर शेष पिछड़े वर्गो की सुध लेने की बात समस्त पार्टियां कर रही है। 
यह बात सामान्य वर्ग को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिये कि वह ‘‘न तो तीन में है न तेरह में‘‘। एक बात स्पष्ट है कि इस देश के सामान्य वर्ग की संख्या पिछड़े वर्ग के बाद अन्य सभी वर्गो अनुसूचित जाति, जनजाति, अल्पसंख्यकों के लगभग बराबर की है (मात्र 1-2 प्रतिशत कम ज्यादा)  ‘‘घर का न घाट का’’ वाली स्थिति में है। बावजूद इसके सामान्य वर्ग के हितों की खुलकर उनकी जनसंख्या की हिस्सेदारी के हिसाब से बात करने वाली वाला कोई भी स्थापित राजनीतिक पार्टी नहीं है। सवर्ण वर्ग के नेता भी अपने हितों को लेकर लेकर उतने अग्रणी नहीं है। वास्तव में वे पिछड़े-अगड़े की लड़ाई में अगड़े कहलाने के बावजूद आगे न होकर बहुत पीछे या यह कहा जाय कि लड़ाई में ही नहीं है, तो ज्यादा ठीक व व्यवहारिक होगा।
सवाल यहां पर वर्ग विभाजन की बात करना बिल्कुल नहीं है। क्योंकि देश के राजनीतिक स्वास्थ्य के लिए यह अत्यंत हानिकारक है। लेकिन जब सभी राजनीतिक दल और मीडिया अगड़े-पिछड़े की बात कर सिर्फ पिछड़ों के राजनीतिक हितों की बात करें और बाकी जनता को उनके हाल पर छोड़ दे जो देश हित में नहीं होगा। इनमें सुधार आखिर कौन ला सकता है? जनता ही इसमें सुधार ला सकती है, जिसके वोटिंग पैटर्न के आधार पर उक्त परसेप्शन उत्पन्न हुआ है, यदि देश हित में वे अपना वोटिंग पैटर्न बदले, तभी। 
अब इन इस्तीफों पर भी कुछ चर्चा करना जरूरी हो गया है। भाजपा के कुछ नेता व मीडिया के कुछ भाग में यह खबर आ रही है कि इन विधायकों की टिकट कट रही थी, और यह युक्तियुक्त आशंका उनको हो गई थी, इसलिए उन्होंने इस्तीफा दिया। यदि यह बात सही है तो भाजपा का उच्च नेतृत्व उन्हें मनाने की कोशिश क्यों कर रहा था? क्या नेतृत्व को यह उम्मीद थी कि वे सब भाजपा की राजनीति में लगभग पांच साल रहकर बदलकर संतों की श्रेणी में आ गये है? और इसलिए वे बिना किसी पूर्व से बड़े राजनैतिक पद-लालच, आर्कषण प्लेटफार्म के पार्टी में वापस लौट आएगें? जब पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा व अन्य पार्टियों से भाजपा में नेताओं की भारी भीड़ आई थी, तब भाजपा ने गले में हार डाल कर उनका हार्दिक स्वागत किया था। तब शायद भाजपा को उनके ‘‘ज्यादा जोगी मठ उजाड़’’ का अंदाजा या आशंका नहीं होगी। अतः तब यदि वे वजनदार नेता थे, जिसका फायदा भाजपा को चुनाव में मिला भी (वे चुनाव जीते भी) तो अब क्या वे अस्तित्व हीन प्रभावहीन हो गए? क्या उनके जाने से पार्टी को नुकसान नहीं होगा? यह कहना या ऐसा आकलन करना पूर्णता सही नहीं होगा। यह भारी दल-बदल पश्चिम बंगाल के चुनाव के समय भाजपा के पक्ष में हुये दल बदल के समान परिणाम लिये (निराशावादी) होगा अथवा पूर्व में जब 2017 में हुये विधानसभा चुनाव के पूर्व दल बदल के समान फायदा (सत्ता) मिलेगी? ‘‘उँट किस करवट बैठेगा’’ यह तो समय ही बतलायेगा। यद्यपि जितना फायदा उनके आने से हुआ होगा, उतना उनके जाने से नहीं होगा क्योंकि पार्टी के पास राज्य व केंद्र में योगी व मोदी जैसे जमीन से जुड़े हुए लोकप्रिय नेता है। यद्यपि उत्तर प्रदेश सरकार के प्रवक्ता और कद्दावर मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने स्वामी प्रसाद मोर्य के पिछड़े कार्ड के जवाब में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पिछड़ा वर्ग होने के कथन की चूक कर दी। नरेन्द्र मोदी सिर्फ एक वर्ग के नहीं, बल्कि समस्त वर्ग के नागरिक प्रधानमंत्री है। 
वर्तमान चुनावी राजनीति में मृतात्माएं (जिन्ना) व जानवर (सांप, नाग व नेवला) की प्रविष्ट होकर वह जीवित व्यक्ति के व्यक्तित्व पर हावी हो रही है। यह राजनीति की गिरती दशा-दिशा का एक और सूचकांक है। तथापि निचले पंचायत स्तर पर जाने वाले नेताओं के प्रभाव को निष्प्रभावी या कम करना इतना आसान नहीं होगा। परंतु इस कारण से एक परसेप्शन जरूर बन रहा है कि डूबते जहाज को बुद्धिमान व्यक्ति छोड़कर चला जाता है। इस कारण से अखिलेश यादव ने एक रेनबो बना कर (सात छोटी-छोटी पार्टियों को जोड़ कर) एक मजबूत विकल्प देने का जो प्रयास कर रहे हैं, को भी मजबूती मिल रही है।
एक और अकाट्य लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य! राजनीति में मूल्यों की नीति, सिद्धांत व नैतिकता को समस्त राजनीतिक पार्टियों ने बेमानी कर दिया है। स्वामी प्रसाद मोर्य के भाजपा को समाप्त करने के लिये उक्त कथन करते समय शायद यह भूल गये कि सांप व नाग मिलकर राष्ट्र को जाति-तोड़ वाले जातिवादी नेवले को अपने में लपेटकर, बांधकर रखने की क्षमता रखते हैं।