कैद में है जिले की मीडिया ?


अनूपपुर। जिले में इन दिनों पत्रकारों की  आपातकाल जैसी स्थिति  है, पत्रकारिता तानाशाही प्रशाशन  के पंजे में कैद है, लोकसेवक अब लाइसेंसी भ्रष्टाचारी होंगे... और पत्रकारिता की लाचारी ऐसी, किसी नामुराद का नाम लेना भी प्रशासन की शान में गुस्ताखी जैसा करना है अनूपपुर में  जैसे मीडिया समूहों को दरबारी पत्रकारिता न करने के गुनाह में पत्रकारों को नोटिस देना किसी मामले में उलझना जैसी सजा दे रही  हैं।  पत्रकार सामाजिक सरोकारों को व्यवस्था की दहलीज तक पहुँचाने और प्रशासन की जनहितकारी नीतियों तथा योजनाओ  को समाज के सबसे निचले तबके तक ले जाने के दायित्व का निर्वाह ही सार्थक पत्रकारिता है और साथ ही शासन प्रशासन के गलत नीतियों और भ्रष्टाचार  को भी जनता तक पहुंचना भी पत्रकार की महती जिम्मेदारी होती है लेकिन पिछले छः महीने से चाहे जिला प्रशासन हो या पुलिस प्रशासन टारगेट बना कर पत्रकारों के खिलाफ षड्यंत्र पूर्वक कार्यवाही करने की फिराक में हैं। दरअसल  अनूपपुर जिले की पत्रकारिता बिलकुल अलग तरीके से चलती है प्रशासन के खिलाफ खबरें होने या अनुपपुर जिले में चल रहे अवैध कार्यों के खिलाफ खबरें लिखने और दिखाने पर जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन उलटे पत्रकारों को फंसाने का काम कर रही है तो वहीं कलेक्टर अनूपपुर खबरों पर मानहानि की नोटिस देकर जवाब मांगते है और जवाब न मिलने पर एफआईआर दर्ज करवा कर कार्यवाही करने की बात  करते हैं। इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए अनूपपुर जिले के समस्त  पत्रकारों ने एक बैठक कर सर्वसम्मति से निर्णय लिया की अब जिले की जनसम्पर्कद्वारा जारी खबरें प्रकाशित नहीं करेंगे साथ ही पुलिस द्वारा भेजी जाने वाली खबरों का प्रसारण और प्रकाशन नहीं किया जायेगा साथ ही जब तक जिला प्रशासन और अनूपपुर पुलिस अपनी कार्यप्रणाली में सुधार नहीं करती,  तब तक जिले भर के पत्रकार काली पट्टी बांधकर अपना कार्य करेंगे जिसकी शुरुआत  मध्यप्रदेश स्थापना दिवस पर सभी पत्रकारों ने काली पट्टी बांध कर अपना कार्य कर विरोध जताया है। जिसकठिन दौर से और भय के वातावरणसे गुजर  रही है, शायद इस जिले में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ