आदिवासी समाज के उत्थान के उद्देश से भटका विश्वविद्यालय- संजय सोनी


भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन के प्रदेश सचिव संजय सोनी ने बताया कि पूरे भारत में आदिवासी समाज के उत्थान हेतु सिर्फ एक ही केंद्रीय विश्वविद्यालय का निर्माण किया गया हैं-इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय आदिवासी समाज की भाषा ,लोकसंस्कृति ,कला ,चित्रकारी , कल्चर , कस्टम ,परम्परा,विरासत, रिसर्च और सोशल एवं इकोनामिक वेलफेयर के उद्देश्य से ही इस विश्वविद्यालय की बुनियाद रखी गयी थी ,ताकि सदियों से हाशिये पर रहे आदिवासी समुदाय को भारत की विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जा सकें। कोई भी विकासशील देश तभी उन्नत और सशक्त बनता हैं ,जब समाज के सभी तबके मुख्यरूप से वंचित समुदाय का सतत् व उन्नत पूर्ण विकास होता हैं।लेकिन इस यूनिवर्सिटी में ना तो यहां आदिवासी समुदाय को कोई विशेष प्रावधान मिलता है और ना ही कोई अतिरिक्त आरक्षण ,जबकि इसकी नींव ही आदिवासी समाज के विकास के लिए हैं।विगत दिन पीएचडी नामांकन के लिए यहां सीटें निकली है। लेकिन साजिश के तहत परीक्षा केंद्र वैसे जगह पर रखा गया ,जहाँ आदिवासी समुदाय का कोई  सम्बन्ध ही नहीं हैं।ना तो यह क्षेत्र आदिवासी बहुल इलाका हैं और ना ही तो यहाँ आदिवासियों का कोई सुगम आवागमन हैं। जब छात्र दाखिला लेने से ही वंचित रह जायेंगे ,तो आदिवासी समाज का कैसा विकास होगा ? किस तरह से उनको मुख्य धारा में लाया जाएगा या किस प्रकार से उनकी संस्कृति या लोकभाषा को बढ़ावा दिया जाएगा ?क्या आदिवासियों के बिना ही आदिवासी समाज का विकास संभव हैं क्या? यह कौन -सा नयाब मॉडल हैं ? अभी यूजी एवं पीजी के लिए सीटें निकली है।जान बूझ कर ऐसे जगहों पर परीक्षा केंद्र रखा गया हैं ताकि आदिवासी बहुल इलाके के बच्चें दाख़िला लेने से वंचित रह जाये।कर्नाटक में 55 लाख ,आंध्र प्रदेश में 60 लाख ,तेलंगाना में 40 लाख ,केरल में 45 लाख ,हिमाचल प्रदेश में 78 लाख और मेघालय में 25 लाख आदिवासी निवास करते हैं ,जबकि यहाँ एक भी परीक्षा केंद्र नहीं दिया गया हैं।अब आप ही बताइए- क्या 3 करोड़ आदिवासी बहुल इलाकों में बिना एक भी परीक्षा केंद्र दिये ,आदिवासी समाज का विकास संभव हैं क्या ?जबकि इस विश्वविद्यालय का उद्देश्य ही आदिवासियों का विकास हैं।विश्वविद्यालय प्रशासन को पहले ही इन विषयों पर नोटिस दिया जा चुका था ,लेकिन यह इतनी बहरी प्रशासन हैं कि अब तक इन मुद्दों पर कोई सुध नहीं ली हैं। माननीय राहुल गांधी जी द्वारा भी इस विषय पर शिक्षा मंत्री को पत्र लिखा गया,कि केरल राज्य के वायनाड जहां अधिकांश संख्या में जनजातीय समुदाय की बहुलता होने के बाद भी विगत वर्षों के भांति वायनाड केंद्र के स्थान पर चेन्नई में परीक्षा केंद्र घोषित किया गया। इस संदर्भ में छात्र नेताओं और विधार्थियों के द्वारा वरिष्ठ कांग्रेस नेता एवं स्थानीय सांसद श्री राहुल गांधी जी को इस संबंध में निवेदन किया गया की वायनाड में परीक्षा केंद्र बनाया जाए  इस मांग को गंभीरता से लेते हुए माननीय राहुल गांधी जी ने केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री श्री रमेश पोखरियाल निशंक जी से वायनाड में परीक्षा केंद्र बनाए जाने हेतु निवेदन किया है बहुत सारे सांसद एवं विधायकों द्वारा भी परीक्षा केंद्र को लेकर कहा गया ,लेकिन अब तक भी प्रशासन ने कोई सुध नहीं ली हैं। और सबसे बड़ी समस्या तो यह है कि इस लॉक डाउन में छात्र कैसे फार्म  को भर पायेंगे? हम सब जानते हैं कि आदिवासी समाज अभी भी सुदूर बहुल इलाकों में निवास करता हैं ,जहाँ ना तो आजादी के इतने दशक बाद भी अभी तक सड़के बनी हैं या शुद्ध पेय जल की कोई व्यवस्था हैं ,जहाँ एक सामान्य कोई पुस्तक खरीदने या फार्म भरने के लिए बच्चों 100 से 150 किलोमीटर की मुश्किल सफर तय करते हैं ,ऐसे स्थिति में उनके पास इंटरनेट की सुविधा होगी ,इसकी कल्पना करना भी बेमानी हैं। और उन जगहों पर परीक्षा केंद्र ना देना भारत की विविधता और राष्ट्रीय एकता के भी खिलाफ होगा। अभी भी विश्वविद्यालय प्रशासन से अनुरोध करता हूँ कि कृपा कर विश्वविद्यालय प्रशासन अपनी इस गलती को सुधार कर परीक्षा केंद्र में बदलाव करें और फॉर्म भरने की तिथि को बढ़ाने की कृपा करें ।अन्यथा राष्ट्रीय छात्र संगठन इस तानाशाही के खिलाफ उग्र आंदोलन करने को बाध्य होगा।