‘‘पत्रकार’’ व ‘‘वकील’’ क्या ‘‘तंत्रों‘‘ से ऊपर है?

राजीव खण्डेलवाल:- 


प्रथम भाग
जब भी किसी प्रसिद्ध ‘पत्रकार’ अथवा ‘वकील’ पर ‘‘आपराधिक कानून’’ के तहत कोई कार्यवाही की जाती है या शुरू किए जाने का प्रयास होता है, तब प्रायः कार्यवाही करने वाले तंत्रों के ‘हाथ पाव फूल’ जाते हैं। क्योंकि पत्रकार और वकील जगत समाज के प्रमुख वर्ग माने जाते है तथा प्रायः वे स्वयं भी इस बात की तसदीक करते है। इस कारण से वे अपने-अपने समूह वर्ग के सदस्यों के व्यक्तिगत हित में यह नारा लेकर खड़े हो जाते हैं कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया और पहला स्तंभ ‘न्यायपालिका’ जिसका वकील वर्ग एक महत्वपूर्ण भाग है, खतरे में आ गया है। ‘‘प्रतिबद्ध’’  न्यायपालिका का खतरा है’’‘‘प्रेस की आजादी को खतरा है’’ और इस खतरे को जब तब बदनाम‘‘आपातकाल‘‘ का नाम दे दिया जाता है। बात ‘रिपब्लिक टीवी’ के मालिक अर्नब गोस्वामी की मुंबई पुलिस द्वारा 2 साल पुराने (बंद) खात्मा लग चुके प्रकरण में की गई गिरफ्तारी के मामले की है। उक्त मामला इंटीरियर डिजाइनर अन्वय नाइक को रिपब्लिक टीवी के द्वारा बकाया भुगतान न करने के चलते तनाव के रहते नाइक व उसकी मां ने आत्महत्या कर ली थी। आत्महत्या के पूर्व स्व. नाइक ने पत्र लिखकर अर्नब पर आर्थिक व्यवहार व धोखाधड़ी का आरोप लगाने पर अर्नब के विरूद्ध प्रकरण पंजीबद्ध किया गया था, जिसमें तत्कालीन फडणवीस सरकार के समय खात्मा रिपोर्ट लग गई थी। मई 2020 में उनकी बेटी अदन्या नाइक की नई शिकायत के आधार पर पुनः जांच के आदेश दिये गये और तदानुसार उक्त गिरफ्तारी की हुई कार्यवाही पर पुनः ध्यान आकर्षित हुआ है। इसके कुछ समय (लगभग ढ़ाई महीने) पूर्व प्रसिद्ध वकील मानवाधिकार व जनहित याचिका विज्ञ प्रशांत भूषण के मामले में भी उच्चतम न्यायालय ने 1 रूपये के मूल्यांकन को बढ़ाकर रूपये का सम्मान बढ़ाकर, प्रशांत भूषण को 1 रूपये जुर्माना भरने के आदेश दिये थे। मुंबई पुलिस द्वारा जिस तरह व तरीके से अर्नब गोस्वामी की उक्त प्रकरण में गिरफ्तारी की गई है और पूर्व में भी पिछले कुछ समय से उनके विरुद्ध विभिन्न आपराधिक अधिनियम के अंतर्गत मुंबई पुलिस द्वारा तीन-तीन बार कार्यवाही की गई है, उन सब सम्मिलित कार्यवाहियों से निश्चित रूप से मुंबई पुलिस और अंततः महाराष्ट्र सरकार की नियत व कार्यवाही पर सवालिया निशान व ऊंगली उठना स्वाभाविक ही है। देश की ‘चलताऊ’ राजनीति के वर्तमान स्वरूप को देखते हुए अर्नब के प्रकरण में सत्ता व कानून के दुरुपयोग के आरोप लगना लाजमी है और आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति भी चलना तय है। परंतु महत्वपूर्ण प्रश्न यहां पर यह है कि अर्नब गोस्वामी के साथ विगत कुछ समय से जो कुछ भी हुआ है, और हो रहा है वह महाराष्ट्र सरकार द्वारा ‘तंत्र’ के तथाकथित दुरुपयोग का मामला हो कर भी क्या उसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अर्थात संपूर्ण मीडिया के विरुद्ध कार्यवाही माना जाना चाहिये? ठीक इसी प्रकार प्रशांत भूषण के विरुद्ध की गई कार्रवाई को भी क्या संपूर्ण वकीलों की जमात के विरुद्ध कार्रवाई माना जाएगा? क्योंकि फैसला आने के बावजूद तत्पश्चात सीनियर वकीलों के एक बड़े समूह ने इस संबंध में सीधे मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र देकर फैसले से असहमति व्यक्त करते हुये सजा देने का विरोध किया था, जो शायद न्यायिक इतिहास में पहली बार हुआ है। क्या इन आधारों पर व्यक्तिगत घटना को सम्पूर्ण वर्ग द्वारा अपने उपर हमला मानकर प्रतिकार किया जाना चाहिये? क्योंकि ‘‘आर भारत टीवी’’ लगातार धमकी भरी प्रतिक्रिया द्वारा यह कह रहा है कि राजनैतिक प्रतिशोध के चलते की गई गिरफ्तारी के कारण न्यायहित में पीड़ित अर्नब को तुरंत छोड़ा जावें। दोषी अधिकारियों को निलंबित किया जाये। अन्यथा 120 करोड़ जनसंख्या के रोड़ पर आ जाने की आशंका है। अर्नब के माध्यम से समस्त ‘‘मीडिया’’ ‘वर्ग’ को पीड़ित रूप में कटघरे में लाने की मंशा के चलते सभ्य समाज में उक्त विषय का गंभीर व अति संवेदनशील बनाये जाने के प्रयास पर गंभीरता से निष्पक्ष रुप से चर्चा कर सही हल व निष्कर्ष निकालने की भविष्य के लिये आवश्यकता है। आइए इसी दिशा में कुछ हल ढूंढ़ने का आगे प्रयास करते हैं।अर्नब गोस्वामी यद्यपि रिपब्लिकन टीवी के प्रधान सम्पादक हैं, जिस कारण से वे चैथे स्तंभ के एक भाग भी हैं, परन्तु पहले वे देश के ‘‘एक नागरिक’’ हैं। प्रश्न यह है कि इस देश में नागरिकों (अर्नब, एक नागरिक सहित) के साथ ज्यादती क्या पहली बार हो रही है? इसके पूर्व में नहीं होती रही ? या भविष्य में नहीं होगी? बेशक एक श्रेष्ठ, स्वस्थ्य व परिपक्व लोकतंत्र में किसी भी नागरिक के साथ एक असहिसष्णुतापूर्वक और कानून का दुरूपयोग कर, पक्षपातपूर्ण एवं बदनियति से प्रतिशोधात्मक कार्यवाही नहीं की जानी चाहिये। परन्तु सुधार के लिये समस्त रूकावटों व सावधानियों के किये गये प्रबंध के बावजूद लोकतंत्र के जन्म से अभी तक यही होता आ रहा है। यद्यपि इसका यह मतलब कदापि नहीं है कि उसका जवाब भी वही असहिसष्णुता, कानून को अपने हाथ में लेना, न्यायपालिका पर अनावश्यक दबाव या घोर अनुउत्तरदायित्व कार्य कलाप हो सकता है। जब किसी भी नागरिक के साथ किसी भी प्रकार ज्यादती होती है तो, उसके पास एकमात्र संवैधानिक अधिकार न्यायालय की शरण में जाकर अपने मूल अधिकारों की रक्षा करना होता है। और अपने संवैधानिक व कानूनी अधिकारों के गैर कानूनी रूप से हनन किये जाने पर सक्षम न्यायालय से हर्जाना मांगने का अधिकार भी होता है। आपराधिक कानून के अंतर्गत किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी के संबंध में उच्चतम न्यायालय ने काफी समय पूर्व एक विस्तृत गाइड़लाईन जारी की थी, जिसे न्यायालय के निर्देशानुसार प्रमुख अखबारों में व्यापक रूप से प्रकाशित भी किया गया था। बावजूद इसके उक्त निर्देशो का कितना पालन होता आता आया है? आरोपी को हथकड़ी लगाने के संबंध में भी उच्चतम न्यायालय द्वारा वर्ष 1978 में सुनील बतरा विरूद्ध दिल्ली प्रशासन के प्रकरण में तत्पशाच कई प्रकरण में जारी गाइड़लाईन का आज भी निरतंर उल्लघंन होता आ रहा है। उच्चतम न्यायालय से लेकर अधीनस्थ न्यायालयों ने और अपनंे को सबसे जिम्मेदार चैनल कहने वाला रिपब्लिक टीवी ने कब? न्यायालय के उक्त बंधनकारी निर्देशों का पालन न होने की आवाज उठाई और उसे न्यायालय की अवमानना मानकर आवश्यक कार्यवाही की मांग कर अपने अतिरिक्त उत्तरदायी या उत्तरदायी होने का परिचय कराया? या इस विषय को लेकर रिपब्लिक टीवी ने क्या न्यायपालिका की गरिमा की सुरक्षा लगातार तीन महीने सुशांत कांड के समान रिपोर्टिंग की? क्योंकि उक्त मुद्दे लोकहित, जनहित, न्यायहित व देशहित से जुड़े है, जिनका रखवाला होने का दावा रिपब्लिक टीवी लगातार करते आ रहा है। राष्ट्रहित के एकमात्र झंडेवरदार सिर्फ रिपब्लिक टीवी ही नहीं है? अन्य अधिकांश चैनल भी अपना अपना सहयोग इस दिशा में देते आ रहे है।  मतलब साफ है, सार्वजनिक जीवन जीने वाले ‘‘सम्मानीयों’’ पर जब कभी कानून का ड़ंडा वैध या अवैध रूप से पड़ता है, तब ‘खुद’ पर आसमान टूट पड़ने के कारण उसे ‘‘तंत्र’’ का मुद्दा बतलाकर देशहित खतरे में हैं, का विलाप करने लगते है। जबकि उनका गलत तरीके से निज स्वार्थ वश उक्त विलाप करना ही देशहित के विरूद्ध है। तब हम क्या उस नागरिक के साथ हुई ज्यादती व्यक्तिगत घटना को ‘‘संपूर्ण तंत्र की असफलता‘‘ या उस पूरे ‘‘नागरिक समाज‘‘ के साथ हुई ज्यादती से जोड़ सकते हैं, प्रश्न यह है?यदि हाँ तो फिर एक ‘‘नागरिक’’ अर्नब गोस्वामी के साथ हुई ज्यादती की घटना को सम्पूर्ण प्रेस जगत के साथ जोड़कर और आपातकाल की परिभाषा तक ले जाना, क्या अपने आप में एक ज्यादती नहीं होगी? क्योंकि अर्नब के विरूद्ध प्रस्तुत मामले में की गई कार्यवाही एक आर्थिक व्यवहार व षड़यंत्र के आरोपों के तहत की गई है। न कि एक पत्रकार का दायित्व निभाते हुये ‘‘कोपभाजन’’ बनने के कारण हुई है। अर्नब यद्यपि एक प्रमुख पत्रकार है, तथापि वे संपूर्ण मीडिया के पर्यायवाची या प्रतिबिम्ब नहीं है,हमें व उन्हे समझना होगा। पुलिसिया तरीके से पुलिस कार्यवाही पर गुस्सा होना/आना स्वभाविक व जायज है। परन्तु पब्लिक डोमेन में रहने वाले खासकर पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य करने वाले व्यक्ति के लिये गुस्से में संतुलन खोना सही नहीं है। जब प्रमुख वर्ग (मीडिया) के एक ख्याती प्राप्त व्यक्ति के साथ शासन-प्रशासन तंत्र द्वारा सत्ता, अधिकारों, नियमों व कानून का दूरूपयोग कर ज्यादती की जाती है, तभी वह प्रमुख व्यक्ति ज्यादती के दर्द को महसूस व अहसास कर पाता है। अन्यथा उनके वर्ग के एक सामान्य व एक सर्वबेहाल आम नागरिक जैसे न जाने कितने नागरिक तंत्र के दुरूपयोग का दिन-प्रतिदिन शिकार होते रहते है। परन्तु उनकी न तो स्वयं की कोई आवाज होती है और न ही कोई उठाता है और वह आवाज एक नामचिन के साथ हुई कथित अत्याचार के शोर में दब जाती है। आम निरीह नागरिक के साथ हुई ज्यादती के गहरे दाग तभी लोगों केा दिखते है या उनका दर्द महसूस होता है, जब तक वह पीड़ित नागरिक पत्रकार या वकील का चोला नहीं पहन लेता है। अब जब तंत्र में आवश्यक या अल्प सुधार भी न हो पा रहा हो, शायद तभी समस्त सार्वजनिक जीवन के प्रमुख व्यक्तिगण अत्याचार से पीड़ित होने पर ही तंत्र की इस कमी को दूर करने के लिये कुछ न कुछ सुधार करने के बाबत अवश्य सोचेंगें और आवश्यक कदम उठा पायेगें। आज के युग में यह भी तंत्र के इलाज का एक मजबूरी में उठाया हुआ कारगर तरीका हो सकता है, और तंत्र को सुधारने की इस दृष्टि से भी अर्नब और उसके साथ खड़े लोगों को सोचने की नितांत आवश्यकता है। 

क्रमशः शेष अगले अंक में............................


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