‘‘एमएसपी‘‘ को लेकर क्या ‘‘सरकार‘‘ किसान और राजनैतिक पार्टियां देश को "गुमराह'' तो नहीं कर रही हैं?

राजीव खण्डेलवाल                               



आपको याद होगा वर्ष 1975-77 में ‘‘आपातकाल‘‘ के समय एक शब्द बहुत प्रचलित हुआ था ‘‘हैबीयस कॉर्पस‘‘ और हिंदी में ‘‘बंदी प्रत्यक्षीकरण‘‘। हजारों लोगों को बिना मुकदमे चलाएं निरोध (नजर बंदी) बनाए जाने के कारण  तत्समय ‘‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता‘‘ के लिए उच्च  और उच्चतम न्यायालय में  बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई थी। तब न्यायालय द्वारा की गई नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा के महत्व को  समझ पाए । इसी प्रकार अभी हाल में ही ‘‘सुशांत‘‘ शब्द सुनते सुनते लोगों के कान के पर्दे फट गए और एक आम नागरिक भी जान गया  कि ‘‘आत्महत्या‘‘, ‘‘आत्महत्या के लिए प्रेरित करना‘‘ और ‘‘हत्या‘‘ में क्या अंतर है। बात ‘‘सुशांत सिंह राजपूत प्रकरण‘‘ की है। अब पिछले एक हफ्ते से आप लगातार सैकड़ों बार एक शब्द ‘‘एमएसपी‘‘ को अवश्य सुन रहे होंगे, पढ़ रहे होंगे या देख रहे होंगे। इसके बावजूद ‘‘एमएसपी की धरातल पर वास्तविक स्थिति‘‘ क्या है, यह समझ में नहीं आ रही है। वर्तमान में देश में विशेषकर दिल्ली में चल रहे तेजी से उग्र होते बढ़ रहे किसान आंदोलन की ‘‘रीढ़ की हड्डी‘‘‘‘एमएसपी‘‘ शब्द हो गई है। आइए इस ‘‘एमएसपी‘‘ शब्द की ‘‘वैज्ञानिक चीर फाड़‘‘ कर धरातल पर "एमएसपी" की सही स्थिति की जानकारी लेकर समझने का प्रयास करते हैं।
‘‘एमएसपी‘‘ का पूर्ण रूप (फुल फॉर्म) मिनिमम सपोर्ट प्राइस या हिंदी में ‘‘न्यूनतम समर्थन मूल्य‘‘ होता है। ‘‘यहां तक‘‘ ‘‘आज तक‘‘ किसी भी पक्ष का कोई विवाद नहीं है। न्यूनतम समर्थन मूल्य की धारणा पहली बार ‘‘जय किसान जय जवान‘‘ का नारा देने वाले  ‘‘सादगी के हीरो‘‘ रहे देश के  प्रधानमंत्री स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री के समय आयी। तत्कालीन कृषि मंत्री चिदंबरम सुब्रमण्यम ने इस धारणा को मूर्त रूप प्रदान किया। पहली बार वर्ष 1966-67 में गेहूं के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की गई। वर्ष 1965 में कृषि मूल्य आयोग का गठन किया गया और 1985 में इसका नाम बदलकर‘‘कृषि लागत मूल्य आयोग‘‘ कर दिया गया। इस आयोग का ही यह क्षेत्राधिकार व यह दायित्व है कि वह एक लंबी ‘‘निर्धारित प्रक्रिया‘‘ को अपनाकर प्रत्येक वर्ष फसल के आने के पूर्व उसकी खरीदी के लिए समर्थन मूल्य जिसे न्यूनतम समर्थन मूल्य कहां गया की घोषणा करें। ‘गन्ने‘ के लिए प्रथक से ‘‘गन्ना आयोग‘‘ बनाया गया। और तब सरकार का यह दायित्व होगा कि वह यह देखें कि सरकारी स्तर पर विभिन्न स्थानीय सरकारी एजेंसियों जैसे नेफेड, भारतीय खाद्य निगम, नागरिक आपूर्ति निगम आदि द्वारा एमएसपी पर किसानों से उनकी फसल की खरीदी अभी जाकर उनका भंडारण होवे। तब से लेकर अभी तक ‘‘एमएसपी‘‘ चल रही है।सरकार ने इसके साथ ही किसानों का व्यापारियों द्वारा किए जाने वाले ‘‘शोषण‘‘ को रोकने के लिए ‘‘एपीएमसी‘‘ जिससे सामान्य रूप से ‘‘कृषि मंडी‘‘ कहते हैं की व्यवस्था भी की। जहां पर लाइसेंसी व्यापारी जिसे ‘‘दलाल या आढतियां‘‘ कहते हैं, के माध्यम से मंडी  प्रांगण में "सफल सर्वोच्च बोली" के द्वारा किसानों को उनकी फसलों का अधिकतम मूल्य मिल सके। परंतु सबसे महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय बात और समस्त संबंधित पक्षों के साथ साद जनता के लिए भी नोट करने वाली बात यह है कि  मंडी प्रांगण में भी न ही कानूनन और न ही व्यवहार में ‘‘एमएसपी‘‘ लागू है। अर्थात यदि मंडी प्रांगण में स्थानीय सरकारी एजेंसी बोली नहीं लगाती है तो, लाइसेंसी व्यापारियों के बीच लगने वाली सफलतम बोली ‘‘एमएसपी‘‘ से कम या ज्यादा हो सकती है। जब स्थानीय सरकारी एजेंसी मंडी में बोली लगाती है, तब निश्चित रूप से उन्हें न्यूनतम एमएसपी कीमत पर ही बोली लगानी होती है। आपको यह भी जानकारी होना चाहिए की देश की कृषि उत्पाद की दो सौ  से भी अधिक फसलें हैं, (जिनमें सब्जियां शामिल नहीं है जिसके लिए भी अब एमएसपी की मांग उठने लगी है)। इसमें से मात्र 23 फसलों पर ही ‘‘एमएसपी‘‘ की घोषणा शासन द्वारा अभी की जा रही है। पूर्व में तो यह संख्या और भी कम थी। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि इन 23 फसलों की कुल उत्पाद की मात्र 10 प्रतिशत से भी कम की ही खरीदी सरकार द्वारा ‘‘एमएसपी‘‘ पर की जाती रही है। शेष खरीदी किसानों व व्यापारियों के बीच सीधे या मंडी में बोली लगाने के माध्यम से होती रही है। जिसका ‘‘एमएसपी‘‘ से कोई लेना देना नहीं है। स्पष्ट है किसानों को उनके उत्पाद (फसल) बेचने पर खरीदार ‘‘एमएसपी‘‘ देने के लिए कतई "बाध्य" नहीं है। सिर्फ बाजार की ‘‘मांग व आपूर्ति‘‘ के नियम के आधार पर ही मांग अधिक होने पर किसानों को बोली में कभी एमएसपी से ज्यादा मूल्य मिल जाता रहा है और मांग कम होने पर एमएसपी से कम मूल्य मिलता रहा है। वर्ष 1965-66 से चली आ रही "कृषि उपज" की खरीदी बिक्री की इस व्यवस्था पर "किसी भी पक्ष" (कृषक सरकार व राजनैतिक पार्टियां) को अभी तक कोई "आपत्ति" क्यों नहीं रही? यह एक बड़ा ही आश्चर्य व "शोध" का विषय है। यह विषय प्रमुख रूप से पहली बार तब सामने आया जब सरकार ने ‘‘कृषि सुधार‘‘ के लिए तीन ‘‘अध्यादेश‘‘ जारी किए, और फिर बाद में संसद में पारित करवाकर उन्हें स्थायी कानून में परिवर्तित किया। इसके पश्चात ही ‘‘एमएसपी‘‘ की बात मुख्य रूप से उठी है। हो सकता हो, इसके पूर्व छोटे-मोटे स्तर पर दबी जुबान में एमएसपी को कानून बनाने के बावत आवाज उठी  हो। परंतु आज इस कारण से किसान आंदोलन ने एक वृहत देशव्यापी आंदोलन का रूप ले लिया है। जिस की चिंता में आप हम सब प्रत्येक नागरिक चिंतित है।तब फिर इस किसान आंदोलन का असली मुद्दा क्या है? प्रत्यक्षतः तो सरकार ने जो तीन कृषि सुधार कानून बनाए हैं, उसकी ‘‘समाप्ति‘‘ की बात किसान नेता कर रहे हैं। ये तीन कानून है।  कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) कानून 2020, कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून 2020 एवं आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम 2020! साथ ही किसान इस बात को भी अपनी उक्त मांग में जोड़ रहे हैं कि ‘‘एमएसपी को कानूनी जामा पहनाया जावे‘‘। क्या इसका यह अर्थ निकलता है कि तीनों कानूनों के द्वारा वर्तमान ‘‘एमएसपी‘‘ की प्रक्रिया में कोई परिवर्तन या उसे समाप्त किए जाने की कोई योजना है ? यदि ऐसा कोई ‘‘भाव‘‘ (परसेप्शन) किसानों के मन में आ रहा है, जो दिख भी रहा है तो, वह निश्चित रूप से पूर्णतः गलत और विद्यमान तथ्यों के बिल्कुल विपरीत है। उक्त तीनों कानूनों में ‘‘एमएसपी‘‘ के संबंध में ‘‘एक शब्द‘‘ भी कहीं नहीं कहा गया है। और यह बात समस्त पक्ष स्वीकार भी कर रहे हैं। तब फिर ‘‘एमएसपी‘‘ को तीनों कानून से जोड़कर उक्त तीनों कानून को समाप्त करने की बात क्यों? इसका ‘‘सही उत्तर ही उत्पन्न समस्या का समाधान‘‘ है।इस बात में कोई शक नहीं है कि उक्त तीनों कानूनों के पारित हो जाने के बाद कृषि उपज के व्यापार के लिए निजी क्षेत्र के लिए "निवेश" के रास्ते खुल जाने के कारण किसानों के मन में एक युक्ति युक्त आशंका अवश्य पैदा हो गई है कि निजी क्षेत्र के बड़े व्यापारी के बीच एक "गठजोड़" बन जाने की या बनाने की स्थिति में मंडी के बाहर कृषि उपज की खरीदी होने  पर छोटा किसान की सौदेबाजी की क्षमता न होने  से ‘‘एमएसपी न मिलने की आशंका‘‘ से किसान ‘‘लुट‘‘ जाएगा। तकनीकी शब्दों में इसे ‘‘मोनापली‘‘ की बजाय ‘‘मोनाप्सली‘‘ की प्रतिस्थापना कहते हैं। अर्थात "विक्रेता" की जगह अब "क्रेता"का प्रभुत्व या दादागिरी हो जाएगी। 5 एकड़ से कम रकबे वाले छोटे किसानों की संख्या इस देश में लगभग 85 प्रतिशत है। उनकी उक्त "युक्तियुक्त आशंका" को दूर करना ही समस्या का समाधान है। क्योंकि इन तीनों कानून के आने के पूर्व "एमएसपी" के संबंध में ऐसी कोई आशंका किसानों के मन में नहीं थी। यद्यपि यह बात भी उतनी ही सही है कि किसान अपनी फसल की 90 प्रतिशत तक की खरीदी के लिए वह निजी मंडी लाइसेंसी व्यापारियों पर ही निर्भर था, जहां ‘‘एमएसपी‘‘ का कोई लेना देना नहीं है।लेकिन किसान, सरकार और विभिन्न राजनीतिक पार्टियां जो इस आंदोलन को ‘‘फ्यूल‘‘ दे रही हैं, उन सब की उक्त व्यवस्था के प्रति मौन स्वीकृति खासकर किसानों की ‘‘मूक भागीदारी‘‘ चली आ रही है। इसीलिए इस समस्या के दो ही समाधान है। प्रथम बल्कि ज्यादा सही समाधान यही है कि सरकार इस बात की गारंटी दे, व्यवस्था करें कि वह किसानों के उत्पाद की सरकारी खरीदी जो अभी मात्र 10 प्रतिशत से कम तक ही सीमित है, उसे बढ़ाकर बड़े पैमाने पर अधिकतम खरीदी कर ली जाए। ताकि निजी व्यापारियों की कृषको पर सीधी दखलाजी कम हो जाए। तब किसान को भी कानून बनाए बिना ही ही ‘‘एमएसपी‘‘ मिलने की गारंटी हो जाएगी।निजी क्षेत्र के व्यापारी जो कृषि उपज का व्यवसाय करना चाहते हैं उनके लिए तब यह विकल्प होगा कि वे कृषि उपज की खरीदी सरकारी एजेंसी से करके मांग और आपूर्ति के सिद्धांत के आधार पर कृषि उपज को बेच सकेंगे। तब इस बात की सौ परसेंट गारंटी किसानों के लिए तो ही जाएगी कि उसकी उपज की खरीदी सरकार ने एमएसपी पर अपनी एजेंसी के माध्यम से की है। पर सरकार के लिए धन व्यवस्था करने व गोदाम की समस्या जरूर आएगी। इसका हल निकाला जा सकता है क्योंकि यह एक अस्थाई समस्या है। इसका एक फायदा यह भी होगा कि सरकार के पास ‘‘बफर स्टॉक‘‘ हो जाने से बाजार में उपज की आवक कम होने की दशा में सरकार अपने स्टॉक को रिलीज करके कीमत को स्थिर भी रख सकती है।दूसरा विकल्प जो सरकार के पास रह जाता है वह ‘‘एमएसपी‘‘ को ‘‘कानूनी रूप देना‘‘ जो फिलहाल किसानों की मुख्य मांग है। इसमें कोई परेशानी भी सरकार को नहीं होनी चाहिए। जब ‘‘लव जिहाद‘‘ के लिए "कानून" बनाया जा सकता है, जो देश की 135 करोड़ की जनसंख्या में ‘‘बहुत बड़ी‘‘ समस्या नहीं है, मात्र उंगलियों पर गिनी जा सकती है। तब लगभग 40 करोड़ों किसानों के लिए ‘‘एमएसपी को कानूनी जामा पहनाने‘‘ में सरकार आनाकानी क्यों कर रही है? वास्तव में सरकार को अपनी स्वयं की घोषित नीति को धरातल पर उतार कर वास्तविकता का असली जामा पहनाने के लिए उक्त दो रास्तों में से एक रास्ते को अपनाना ही होगा। क्योंकि यह स्पष्ट है कोई भी सरकार संसद द्वारा भारी बहुमत से पारित अपने कानून को एक "आंदोलन" के झटके में खत्म (शून्य) करने के लिए तैयार नहीं होगी। जो किसानों की मांग है। किसानों को भी यह समझना होगा कि अंततः कानून बनाने का काम उन चुने गए सांसदों जिन्हें किसानों ने भी चुना है, ने किया है। एक और तीसरा विकल्प यह भी हो सकता है कि "स्वामीनाथन रिपोर्ट" जिसे समस्त पक्षों ने स्वीकारा भी है, के आधार पर सरकार फसल के लागत मूल्य का दोगुना मूल्य मिलने की व्यवस्था बनायें, जिस पर सरकार कार्य भी कर रही है। जब किसानों को "एमएसपी" की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी, क्योंकि तब वे आर्थिक रूप से सूदृढ़ होकर अपनी फसलों का मूल्य तय करने में स्वयं सक्षम होगें। लेकिन यह दीर्घकालीन व्यवस्था है। इससे तुरंत आंदोलन समाप्त नहीं होने वाला है।


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