गणतंत्र दिवस 2021, ‘‘गण‘‘ व ‘‘तंत्र‘‘ के बीच उत्पन्न हुई ‘‘रार‘‘ कैसे खत्म होगी?

राजीव खंडेलवाल :-

देश में प्रति वर्ष 26 जनवरी को मनाये गये गणतंत्र दिवस के समान ही इस वर्ष भी  गणतंत्र दिवस मनाया गया। परंपरागत रूप से प्रत्येक वर्ष गणतंत्र दिवस मनाये जाने के बावजूद हर साल का गणतंत्र दिवस अपने पिछ्ले गणतंत्र दिवस से कुछ न कुछ विशिष्टता और नयापन लिये होता ही है। परिणामतः इस वर्ष का गणतंत्र दिवस भी पिछले वर्ष के गणतंत्र दिवस से कई मायनों में कुछ विशिष्टता और भिन्नता लिये हुए है। किस तरह से कितना परिवर्तन इस गणतंत्र में हमें देखने को मिला, इसकी विवेचना की ही जानी चाहिये, ताकि हम यह समझ सकें कि यह परिवर्तन कितना सकारात्मक या नकारात्मक रहा हैै जिससे वर्ष 2022 का गणतंत्र और उपलब्धियों के साथ मनाया जा सके। पहले इसके सकारात्मक पहलुओं की चर्चा कर लें। आपको याद ही होगा कि पिछले वर्ष 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाये जाते समय कोविड-19 (कोरोना वायरस) के घने बादल चीन से प्रारंभ होकर विश्व में तेजी से फैल रहे थे। भारत में भी कोरोना वायरस के संक्रमण की आशंका के संकेत मिलने प्रारंभ हो गये थे और अधिकृत रूप से कोविड-19 का प्रथम संक्रमित मरीज भारत में 30 जनवरी को केरल प्रदेश के त्रिशुर शहर के ‘‘कासरगोड‘‘ गांव में पाया गया था। अर्थात हमारे गणतंत्र दिवस-2020 का प्रारंभ ही नयी वैश्विक बीमारी कोविड-19 के साथ हुआ, जो तेजी से हमारे देश सहित विश्व के अनेक देशों में फैलता चला गया। लेकिन आज गणतंत्र 2020 की समाप्ति पर और नये गणतंत्र 2021 के प्रारंभ होने पर हमने पिछले गणतंत्र के प्रारंभ की तुलना में आज निश्चित रूप से विश्व के अन्य देशों की तुलना में कोरोना वायरस संक्रमण को काफी हद तक नियंत्रित कर कुछ निश्चिंतता की स्थिति को प्राप्त अवश्य किया है।यद्यपि कोविड-19 पूरी तरह से समाप्त नहीं हुआ है। लेकिन बीच में एक समय ऐसा था, जब हमारे देश में प्रतिदिन औसतन 50000 से अधिक नये लोग संक्रमित हो रहे थे, इसकी तुलना में आज प्रतिदिन औसतन 5000 से भी कम लोग संक्रमित हो रहे हैं। इसी प्रकार ‘‘मृत्यु-दर’’ घटाने और ‘‘रिकवरी रेट’’ में वृद्धि करने में भी हमने ‘‘अपना हाथ जगन्नाथ‘‘ की उक्ति को अपनाते हुए, कुशल प्रबंधन द्वारा नियंत्रण कर अच्छी सफलता प्राप्त की है। इसके लिए हमारे समस्त स्वास्थ्य कर्मचारी, कोरोना वारियर बधाई के पात्र हैं। यह सब इसलिये हो पाया, क्योंकि ‘‘गण‘‘ और ‘‘तंत्र‘‘ के बीच सामंजस्य बिठाने का प्रयास दोनों तरफ से हुआ, जिसके उपरोक्त सफल परिणाम निकले। यही हमारे गणतंत्र की विशिष्टता और सफलता है। यद्यपि नागरिकों के बहुत से अनुउत्तरदायी, आत्मघाती व्यवहार भी देखने को मिले है। विश्व के कुछ देशों में तो राष्ट्राध्यक्षों को कोरोना वायरस से निपटने में सफलता प्राप्त न मिलने पर इस्तीफे़ तक देने पड़ गए। जैसे आज इटली के राष्ट्राध्यक्ष को इस्तीफा देना पड़ गया।

परंतु आज ‘‘गणतंत्र‘‘ का प्रारंभ 63 दिन से अधिक हो चले किसान आंदोलन से ‘‘आतंकित‘‘ है या ‘‘अलंकृत‘‘ है, यह गहरे विवाद के साथ ही गहन विषाद का विषय भी है। लोकतंत्र में बिना ‘‘गण‘‘ के ‘‘तंत्र‘‘ अस्तित्वहीन है और बिना ‘‘तंत्र‘‘ के ‘‘गण‘‘ अराजकतावादी हो जाता है। इसीलिए गण और तंत्र के जुड़े रहने से ही गणतंत्र की महत्ता और उसका वजूद है। 

आज संविधान दिवस पर राजपथ पर राष्ट्रीय परेड़ के साथ किसानों की ट्रैक्टर रैली का क्या और कितना औचित्य है? यह विचारणीय है। क्या किसान राज पथ पर इकट्ठे होने वाले ‘‘गण‘‘ से अपने को अलग ‘‘गण‘‘ मान रहे थे? जो उन्होंने अलग से अपनी शक्ति दिखाने का निर्णय लिया। क्या यह शक्ति प्रदर्शन राष्ट्रीय दिवस गणतंत्र दिवस को छोड़कर अन्य दिन नहीं हो सकता था? क्योंकि गणतंत्र दिवस, विश्व में हमारी राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक है। क्या इसके यह मायने नहीं निकलते हैं कि किसान संगठन अपने आंदोलन के प्रति विश्व का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं? और अंततः जिस अराजकता की आशंका व्यक्त की जा रही थी, वह अशांति और अराजकता की स्थिति दिल्ली में प्रवेश करने वाले समस्त मार्गों में थोड़ी बहुत होती हुई दिखायी दी। इस कारण आंदोलनरत कुछ प्रमुख किसान नेताओं को भी यह स्वीकार करना पड़ा कि पिछले 2 महीने से ज्यादा से चला आ रहा आंदोलन, जो कि प्रायः शांतिपूर्ण रहा, और जो शांति आंदोलन का बल थी,उसके भंग होने से आंदोलन कमजोर होगा। यह तो वही बात हुई कि ‘‘अंधे अंधा ठेलिया दोनों कूप पड़ंत‘‘! इस स्थिति को टालने के लिए ही तो सरकार लगातार बार-बार किसान संगठनों से आज के दिन ट्रैक्टर रैली न निकालने का (असफल) अनुरोध कर रही थी। किसान नेताओं द्वारा दिल्ली में की जाने वाली ट्रैक्टर रैलियों के औचित्य को सिद्ध करने के लिये इसे गणतंत्र में भाग लेने वाला अभूतपूर्व कदम बताया गया! कहा गया कि गणतंत्र दिवस पर यदि जवानों की परेड हो सकती है तो, किसानों की क्यों नहीं। परंतु दुर्भाग्यवश यह वास्तव में तब ‘‘अभूतपूर्व‘‘ हो गया, जब ‘‘लाल किले‘‘ पर जहां स्वतंत्रता प्राप्ति से अभी तक सिर्फ देश के प्रधानमंत्री ही तिरंगा झंडा फहराते रहे, वहां इन आंदोलनकारियों ने या इनके बीच घुसे अराजक तत्वों ने (जैसा कि बाद में कुछ किसान नेताओं ने ऐसा कह कर अपना पल्ला झाड़ लिया) उस जगह तिरंगे के बदले दूसरा झंडा लगा दिया। जो झंडा लगाया गया उसे सिख धर्म में ‘‘निशान साहिब‘‘ कहा जाता है और यह सिख धर्म में बड़ा ‘‘पवित्र‘‘ माना जाता है! और इसलिये भी एक पवित्र निशान को गलत तरीक़े से सही जगह न रखना या न लगाना भी यह दिखाता है कि उन तत्वों का सिख धर्म के प्रति कितना सम्मान है। इससे यह भी दृष्टिगोचर होता है कि उनके मन में अपने राष्ट्र के ‘‘गणतंत्र‘‘ के प्रति कितनी आस्था है। ‘‘यानी दूसरे का असगुन करने के लिये अपनी नाक कटाना‘‘। अतः स्पष्ट है आज का यह गणतंत्र दिवस गण और तंत्र के बीच जो एक दरार खींच गया, उसे तुरंत भरा जाये, इसी में ही समझदारी है, यही देशभक्ति है और यही हमारी गणतंत्र दिवस के प्रति सच्ची भावना होगी। अंत में मैं आंदोलनरत किसानों और किसान संगठनों व उनके नेताओं से अनुरोध करना  चाहता हूं कि देश में 26 जनवरी को संविधान लागू होने के दिवस पर किसानों को क्या यह विचार नहीं करना चाहिए कि इस दिन संविधान लागू हुआ था? (न कि निरस्त हुआ था?) जिसके द्वारा कानून बनाने की शक्ति संसद को मिली। इसलिए आज शक्ति प्राप्त संसद द्वारा पारित उस कानून जिसे लागू हुए मात्र 4 महीने भी नहीं हुए है, की समाप्ति की बात करना संवैधानिक और न्यायोचित नहीं है। यद्यपि वर्तमान में उच्चतम न्यायालय ने उक्त कानून के लागू होने पर रोक अवश्य लगा दी है। और सरकार ने भी ऐसा ही रोक का प्रस्ताव डेढ़ वर्षो के लिये संयुक्त किसान मोर्चा की बातचीत के दौरान दिया है। ऐसा नहीं है कि संसद ने देश में लागू किए गए कानूनों को समाप्त कर उनके स्थानों पर नए कानून नहीं बनाएं हो। जैसे ब्रिटिश इंडिया के जमाने से वर्ष 1861 में लागू दंड प्रक्रिया कानून को समाप्त किया जाकर वर्ष 1973 में नया दंड प्रक्रिया संहिता क़ानून बनाया गया। इसी प्रकार आयकर अधिनियम 1961 को समाप्त कर नया ‘‘प्रत्यक्ष कर संहिता’’ लागू करने का प्रस्ताव पिछले कई सालों से (वर्ष 2000) से विचाराधीन है। 1 जुलाई 2017 से लागू जीएसटी को अभी मात्र साढ़े तीन वर्ष ही हुए हैं, जब की उसमें आवश्यकता अनुसार अभी तक 46 संशोधन हो चुके हैं। कहने का मतलब यही है कि किसी क़ानून को रद्द या समाप्त कर उसकी जगह नया क़ानून लाने में वर्षो लग जाते है। तब तक संशोधनों की बाढ़ लग जाती है। क्योंकि उनके परिणामों का विश्लेषण होता है। वही स्थिति इन तीनों भूमि सुधार कानूनों के साथ भी हो सकती है। इसे किसान समझने को तैयार क्यों नहीं है जबकि सरकार तीनों कानूनों में आवश्यक संशोधन करने के लिए तैयार है, यह कथन वह ग्यारह दौरों की बातचीत के दौरान बारंबार कह चुकी है। किसान नेताओं की नजर में यदि काले कानूनों की समस्त धाराएं किसानों के हितों के विपरीत हैं, तो वे उक्त समस्त धाराओं के बदले नई धाराओं का संशोधन का प्रस्ताव देकर गेंद सरकार के पाले में क्यों नहीं डालते हैं? इससे उनका उद्देश्य भी पूरा हो जाएगा और सरकार समस्त आवश्यक संशोधन करके संसद द्वारा पारित तीनों कानूनों के अस्तित्व को बनाए रख उसकी सार्वभौमिकता की रक्षा भी हो जाएगी। अन्यथा अब यही माना जाएगा कि लड़ाई दोनों पक्षों के बीच सिर्फ ‘‘अहम’’ (ईगो) की रह गई है, मुद्दों की नहीं, क्योंकि सरकार भी एमएसपी पर सहमत होने के बावजूद क़ानून बनाने में ‘‘दाये बाये’’ हो रही है।

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