‘‘दिल्ली पुलिस’’ और ‘‘पंजाब की राज्य सरकार’’ क्या लक्खा सिंह ‘‘दंगाई‘‘ से मिले हुए हैं?

राजीव खण्डेलवाल:-                                                             

लंबे समय से चल रहे किसान आंदोलन के दौरान 26 जनवरी को दिल्ली में ‘‘लाल किले‘‘ में हुई 'शर्मनाक' हिंसक घटना का एक प्रमुख आरोपी ‘‘भगोड़ा‘‘ लक्खा सिंह सिधाना, जिस पर दिल्ली पुलिस ने एक लाख रुपए का इनाम घोषित किया है, आज पूर्व घोषणा अनुसार पंजाब के ‘‘बठिंडा‘‘ जिला के मेहराज गांव में किसान रैली में सरेआम घूमता हुआ सार्वजनिक रूप से शामिल हुआ। यद्यपि इस रैली के आयोजन से 'संयुक्त किसान मोर्चा' (एसकेएम) दूर ही  रहा। तथा उनके प्रमुख नेताओं (चेहरों) ने इस सभा में शिरकत नहीं की। परंतु इससे भी ज्यादा आश्चर्य की बात तो यह रही कि इस रैली में शामिल होने की घोषणा की जानकारी गैंगस्टर लक्खा सिंह सिधाना जिस पर दर्जनों आपराधिक मामले दर्ज है व कई बार जेल जा चुका है, ने पहले ही एक अपना वीडियो मीडिया में जारी करके दे दी थी।  संख्या की दृष्टि से भारी भीड़ की उपस्थिति भी संयुक्त किसान  मोर्चा व  सरकार के लिए एक चिंता की बात इसलिए हो सकती है कि लक्खा सिंह के साथ दूसरा प्रमुख आरोपी ‘‘दीप सिद्धू’’ को किसान नेताओं ने 26 जनवरी के हिंसक घटना के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए उन्हें अपने आंदोलन से दूर रखने की घोषणा की थी। सरकार के लिए चिंता की बात यह है कि  एक हिंसक  भगोड़े घोषित अपराधी के लिए  बड़ी संख्या में  जनता सुनने आई । बावजूद इसके किसी भी ‘‘तंत्र‘‘ (दिल्ली व पंजाब पुलिस) द्वारा उसके खिलाफ कोई कार्रवाई न की जाकर गिरफ्तारी का प्रयास नहीं किया गया। बल्कि लक्खा सिंह ने रैली के मंच पर पहुंच कर उद्धबोधन कर सब को ठेंगा दिखा दिया। कानून को ठेंगा दिखाते हुए यह "ठेंगा" सिर्फ केंद्रीय सरकार जिसके अधीन दिल्ली पुलिस है की ओर ही नहीं है, बल्कि पंजाब पुलिस जिसके राज्य व अधिकार क्षेत्र में यह कार्यक्रम हुआ है, की ओर भी है। यह घटना  एक सामान्य नागरिक को इस बात पर सोचने पर विवश, मजबूर कर रही है कि, क्या हमारा ‘‘तंत्र‘‘ इतना   खोखला कमजोर, मजबूर और विवश हो गया है, अथवा केंद्र और राज्य सरकार के संबंध इतने संवाद हीन स्तर पर आ गए हैं कि एक घोषित अपराधी सब की ‘‘आंखों में धूल झोंक कर नहीं‘‘ बल्कि सरेआम सीना (कितने इंच का पता नहीं) तांनते हुए मंच पर पहुंचता है, और हजारों लोगों को न केवल संबोधित करता हैं, बल्कि सैकड़ों तालियां भी बटोरता है। यहीं तक  ही नहीं,  बल्कि वह अपने भाषण में धमकी भरे अंदाज में अपनी बात कहता है। क्या इस कार्यक्रम के आयोजक और उपस्थित जनता एक भगोड़ा अपराधी को शरण देने के आरोप से मुक्त हो सकती है? "टूल किट" मामले में जब जांच एजेंसियां उसमें शामिल "समस्त" लोगों को एक ही पैमाने से एक ही ‘‘तीव्रता‘‘ लिए हुए "अपराधी" मान रही है, तब वह सिद्धांत यहां पर क्यो नहीं लागू किया जाता है? शायद दिशा की गिरफ्तारी से कुछ देसी विदेशी तथाकथित लोकतंत्र और मानवाधिकार के रक्षकों की "भड़ास" से उत्पन्न लोकतंत्र व व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार पर आए तथाकथित संकट के बादल से निपटने के लिए तो पुलिस ने लोकतंत्र व व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को और उदार (लिब्रेलाइज) करने की दृष्टि से गिरफ्तार न किया हो? ऐसा बताया गया कि दिल्ली पुलिस वहां मौजूद थी । यह कहना कि मंच पर लक्खा सिंह को गिरफ्तार करने पर हिंसक घटनाओं के भड़कने की आशंका थी, बहुत ही लचीला और पुलिस की कमजोरी को सिद्ध करने वाला स्वयंसिद्ध तर्क है। प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि पूर्व जानकारी होने के बावजूद लक्खा सिंह मंच पर पहुंच कैसे गया? दिल्ली पुलिस द्वारा भी इस बात का कोई दावा नहीं किया गया है कि उसने पंजाब पुलिस को इस बात की सूचना देकर उनसे अनुरोध किया था कि लक्खा सिंह की बठिंडा की सभा में पहुंचने की संभावना है । अतः उसके खिलाफ  कड़ी आवश्यक कार्रवाई की जावे । पुलिस तंत्र व मीडिया क्या लक्खा सिंह को भी "मोहम्मद साद" बना देगा ? आप जानते ही हैं की "साद" जमात का वह व्यक्ति है जिसके खिलाफ  आपदा महामारी अधिनियम के अंतर्गत पूरे देश में संक्रमित बीमारी कोरोना को फैलाने का आरोप दस महीने पहले पूरे देश में जोर शोर से प्रचारित किया जाकर साद को एक अपराधी व कोरोनावायरस को फैलाने वाले खलनायक के रूप में महिमामंडित किया जाकर  बिना गिरफ्तार किए व मुकदमा चलाएं ही, शायद  "दोषमुक्त" मानकर पुलिस और मीडिया दोनों ही उसे भूल गए हैं और जनता की आंखों के परदे से भी उसे "विलुप्त" कर दिया गया । क्या ऐसी ही स्थिति लक्खा सिंह के साथ भी होने वाली है? प्रश्न यह है।  अभी कुछ दिन पूर्व ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश में फिल्मों के निर्माण हेतु फिल्म सिटी बनाने की न केवल घोषणा की थी, बल्कि उसके लिए आवश्यक धन का बजट प्रावधान भी किया है। ताकि मुंबई से कुछ फिल्म निर्माता और कलाकार उत्तर प्रदेश आ जाएं। यह बात ध्यान दिलाने का एक मात्र उद्देश्य यह है कि यह जो घटना हुई है, वह बिल्कुल फिल्मी स्टाइल में एक फिल्म की शूटिंग के समान हुई है, जैसा कि हम  फिल्मों में होते हुए देखते हैं। ऐसा लगता है उत्तर प्रदेश में तो अभी फिल्म सिटी बनना दूर है, लेकिन पंजाब में ‘‘हम से आगे कोई नहीं‘‘ की तर्ज पर शायद फिल्म निर्माण करने का निर्णय ले लिया हो?  फिल्म निर्माता" रियललाइफ" (वास्तविक जीवन) को लेकर फिल्मों का निर्माण करते रहे हैं। लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि 21वीं सदी के तेजी से बढ़ते विकास के युग में अब ‘‘रील लाइफ‘‘ (फिल्मी जीवन) में जो कुछ दिखाया जा रहा है, उसको वास्तविक रूप देने का प्रयास शायद जनता व सरकार मिलकर रही है? लक्खा सिंह का मंच पर भाषण इसी  "युति" का परिणाम तो नहीं हैं?

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