प्रधानमंत्री की (सरकारी कार्यक्रम में) मुख्यमंत्री ममता के प्रति ‘‘ममत्व’’ की कमी! कितना औचित्य पूर्ण?

प्रधानमंत्री ने कोलकाता के विक्टोरिया पैलेस में ममता बनर्जी की उपस्थिति में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती ‘‘पराक्रम दिवस’’ के रूप में मनाने के कार्यक्रम में अपने उद्बोधन में ममता या उनकी सरकार पर कोई कटाक्ष या आलोचना नहीं की थी। तब बीपीसीएल की एलपीजी इंपोर्ट टर्मिनल व डोभी-दुर्गापुर नेचुरल गैस पाइपलाइन सेक्शन को राष्ट्र को समर्पित करने वाले पूर्णतः सरकारी कार्यक्रम में ममता की अनुपस्थिति में ममता या पश्चिम बंगाल सरकार पर आरोप लगाने को उचित और सामयिक नहीं कहा जा सकता है।

देश में इस समय किसान आंदोलन के बाद सबसे ज़्यादा चर्चा का और मीडिया में छायी हुई विषय वस्तु यदि कोई है, तो वह पश्चिम बंगाल में होने वाले आगामी विधानसभा के आम चुनाव। जहां पर प्रमुख रूप से तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच गला-काट प्रतिस्पर्धा के फलस्वरूप राजनीतिक संघर्ष, मारामारी की सीमा तक काफी पहले से ही पहुंच  चुकी है। ऐसा लगता है कि पश्चिमी बंगाल एक बार फिर "प्लासी के युद्ध की स्थिति में" पहुंच चुका है । भाजपा ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में काफी पहले से यह एजेंडा बना लिया है कि यदि पश्चिम बंगाल से ममता की विदाई ‘‘ममता पूर्वक‘‘ संभव न तो येन केन प्रकारेण पूरी ताकत के साथ ‘‘विदाई‘‘ दे दी जाए। अर्थात ‘‘सीधी उंगली से घी न निकले’’ तो ‘‘उंगली टेढ़ी’’ करने में कोई गुरेज़ नहीं। इस मामले में नरेंद्र मोदी और अमित शाह काफी दूरदर्शी दृष्टि वाले नेता है, जिन्होंने अपने नेतृत्व की दूरदर्शिता की छाप कई बार स्थापित व  सिद्ध भी की है। इसी कड़ी में कई लोगों का तो यहाँ तब कहना है कि प्रधानमंत्री जी ने जो ‘‘दाढ़ी‘‘ बढ़ा रखी है, वह पश्चिम बंगाल में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव को दृष्टि में में रखते हुए राष्ट्रीय कविवर रविंद्र नाथ टैगोर की जन्म भूमि व कर्मभूमि पश्चिम बंगाल होने के कारण ‘‘बंगाली सेंटीमेंट्स‘‘ से जुड़ने के लिए की गई है। खैर! भाजपा नेतृत्व के सतत प्रयास का ही आज यह परिणाम है कि लेफ्ट पार्टी व कांग्रेस को पीछे छोड़ के पश्चिम बंगाल भाजपा पिछले पांच वर्षो में चतुर्थ स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंच गई।   मैं बात कर रहा था, प्रधानमंत्री की हल्दिया में हुई सभा की की। रविवार 7 फरवरी को पश्चिम बंगाल के हल्दिया में प्रधानमंत्री की सरकारी सभा का आयोजन हुआ था। जिसमें लगभग 5000 करोड़ से ऊपर की पश्चिम बंगाल के विकास जुड़ी इन परियोजनाओं का लोकार्पण व शिलान्यास प्रधानमंत्री द्वारा किया गया। निमंत्रित होने के बावजूद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस कार्यक्रम में नहीं पहुंची। 23 जनवरी को कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल हॉल में सुभाष चंद्र बोस की 125वी जयंती पर हुए कार्यक्रम में दर्शकों के एक वर्ग द्वारा ‘‘जय श्रीराम’’ के नारे लगाकर उनका मज़ाक उडाये जाने को लेकर वे ख़फा है। प्रधानमंत्री की मौजूदगी में ‘‘जय श्रीराम’’ के नारे लगने से वे नाराज हो गयीं थीं, और उन्होंने यह कहकर कि बुलाकर ‘‘अपमान अस्वीकार्य‘‘ है, उक्त सभा में अपना भाषण नहीं दिया था। यद्यपि नारे प्रधानमंत्री की सहमति या अनुमति से नहीं लगे थे। लेकिन किसी व्यक्ति को चिढ़ाने के उद्देश्य से भगवान श्रीराम के पावन नाम को एक माध्यम बनाया जाये, यह अपने आप में एक निंदनीय कृत्य है। परंतु ठीक इसके विपरीत, एक भारतीय हिन्दू के भगवान श्रीराम के नारे से चिढ़ना तो और भी ज्यादा शर्मनाक व निंदनीय है। यदि ममता को भगवान श्रीराम के नारे से सार्वजनिक रूप से इतनी चिढ़  है (यद्यपि जो उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है) तो वह  प्रत्युत्तर में  प्रधाlनमंत्री के मंच पर चढ़ते समय अपने कार्यकर्ताओं से "अल्लाह हो अकबर" के नारे क्यों नहीं लगवा दिए। निश्चित रूप से मोदी की वह प्रतिक्रिया नहीं होती जो ममता ने की थी।हल्दिया में 7 फरवरी को एक पूर्णतः सरकारी कार्यक्रम संपन्न हुआ। यह भाजपा की कोई चुनाव रैली तो थी नहीं? इसलिए प्रधानमंत्री की मौजूदगी में ‘‘जय श्रीराम’’ के नारे लगने से ममता नाराज हो गई । और शायद इसीलिए ममता ने यह तय कर लिया कि आगे वे प्रधानमंत्री के साथ मंच साझा नहीं करेगी। क्योंकि "काठ की हांडी बार-बार चूल्हे पर नहीं चढ़ाई जा सकती है"। ममता की प्रधानमंत्री के सरकारी कार्यक्रम से "सोउद्देश अनुपस्थिति' क्या एक संवैधानिक पद में बैठे हुए व्यक्ति द्वारा अपने से ऊंचे  संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का अपमान व अनादर नहीं है ? साथ ही लोकतंत्र में यह जनता का भी एन अनादर है ।  तथापि प्रधानमंत्री ने ममता की अनुपस्थिति में, अपने उद्धबोधन में ‘‘ममता मयी’’ न होकर (कभी वह हुआ करते थे) "निर्ममतापूर्वक ममता की निर्ममता को उज़ागर किया"। प्रश्न यह कि एक पूर्णतः सरकारी कार्यक्रम में जिसमें सरकारी योजनाओं का उदघाटन-शिलान्यास किया गया हो में, प्रधानमंत्री द्वारा ममता बनर्जी व राज्य सरकार की राजनीतिक रूप से आलोचना करना कितना नैतिक, उचित और जायज है?

            भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, गृहमंत्री अमित शाह से लेकर भाजपा के पश्चिम बंगाल के राष्ट्रीय प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय आदि अनेक नेताओं का पश्चिम बंगाल का लगातार सतत दौरा चल ही रहा है, जिसमें वे ममता  सरकार के विरुद्ध लगातार तथ्यों व साक्ष्यों के आधार पर ममता को जनता के बीच सफलतापूर्वक ‘‘विलेन‘‘ ठहरा रहे हैं। यह उनका अधिकार भी है। नरेंद्र मोदी जी को भी भाजपा की रैली में भाजपा नेता के रूप में सरकार व मुख्यमंत्री की आलोचना करने का पूर्ण अधिकार है, इसमें कोई शकबो सुबह नहीं है। लेकिन एक केंद्रीय सरकारी कार्यक्रम में राज्य सरकार की  "राजनैतिक" आलोचना करना कहां तक उचित है?  यदि ममता बनर्जी नेताजी सुभाष चंद्र बोस के 125 वीं जयंती के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री के खि़लाफ कुछ बोलती तो, क्या वह जायज व उचित होता? बिल्कुल नहीं! विपरीत इसके, इससे तो अंतर्राष्ट्रीय पटल पर भी एक खराब संदेश ही जाता। यद्यपि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का प्रधानमंत्री की उपस्थिति में मंच से ‘‘जय श्रीराम’’ के नारे लगाने पर अपनी नाराजगी व्यक्त कर ‘‘अतिथि को निमंत्रण देकर, बुलाकर, बेइज्जत व असम्मानित करने का कथन’’ करना, साथ ही अपने उद्बोधन में कुछ  न बोलना भी समय व कार्यक्रम की गरिमा को देखते हुए वांछनीय व सही नहीं था। भारतीय राजनीति में तो प्रत्येक राजनीतिज्ञ को हर पल "राजनीति" करने का खूब अवसर मिलता रहता  है। परंतु कुछ अवसर ऐसे होते हैं जहां "राजनीति" छोड़कर "नीतिगत" बात ही करना चाहिए। "अन्यथा करधा छोड़ तमाशा जाए, नाहक चोट जलाहा खाए" वाली स्थिति बन जाती है। उक्त अवसर भी एक ऐसा ही "अवसर" था।प्रधानमंत्री ने कोलकाता के विक्टोरिया पैलेस में ममता बनर्जी की उपस्थिति में  नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती ‘‘पराक्रम दिवस’’ के रूप में मनाने के कार्यक्रम में अपने उद्बोधन में ममता या उनकी सरकार पर कोई कटाक्ष या आलोचना नहीं की थी। तब बीपीसीएल की एलपीजी इंपोर्ट टर्मिनल व डोभी-दुर्गापुर नेचुरल गैस पाइपलाइन सेक्शन को राष्ट्र को समर्पित करने वाले पूर्णतः सरकारी कार्यक्रम में ममता की अनुपस्थिति में ममता व पश्चिम बंगाल सरकार पर आरोप लगाने को उचित और "सामयिक" नहीं कहा जा सकता है। प्रधानमंत्री जी को इससे बचना चाहिए था।

Popular posts
मध्य प्रदेश में सियासी हलचल तेज, मंत्री बिसाहूलाल सिंह को भोपाल लेजाने अचानक पंहुचा हेलीकॉप्टर
Image
जिला मुख्यालय को शीघ्र मिलेगी बाई पास मार्ग की सौगात मंत्री बिसाहूलाल सिंह के प्रयासों ने बिखेरी विकास की चमक
Image
रेलवे फ्लाईओवर ब्रिज निर्माण में हो रही देरी को लेकर पूर्व विधायक रामलाल रौतेल करेंगे अनिश्चितकालीन उपवास
Image
परासी - तितरीपोंडी,पसला- चरतरिया, धिरौल- पटना मार्ग निर्माण शीघ्र
Image
स्वागत बंदन अभिनन्दन
Image