नगरीय चुनाव :एक अवसर- शेष नारायण राठौर

 

अनूपपुर /"राज कलस्य कारणम् "संक्षेप में इसका आशय मात्र इतना है कि समाज की उन्नति और अवनति राजनीति के अनुरूप ही होगी क्योंकि राजनीति समाज को व्यापक रूप से प्रभावित करती है । राजनीति ही यह तय करती है कि द्वारिका का नव सृजन होगा या हस्तिनापुर का पतन ।राजनीतिक सुचिता धृतराष्ट्र और दुर्योधन जैसे मानसिकता वाले लोगों को नही सुहाता है ।राजकीय कोष को मुक्त हाथों से बाँटने के उपरांत भी वांछित लाभ दुर्योधन को नही मिला बल्कि उसके "केवल मै"के कुंठित राजनीति के भाव में उतरोत्तर बृद्धि होता रहा और एक अनैतिक राजनीति का उदय हुआ जिसमें सात्विक राजनीति को लाक्षाग्रह में नष्ट करने का कुचक्र रचा जाता है।राजनीति का कुंठित भाव "मै और मेरा परिवार " केवल व्यक्ति विशेष का नही समस्त समाज का सर्वाधिक नुकसान करता है । मै जो सोचू, मै जो कहूँ वही सत्य है ;की प्रवृत्ति जनता को प्रलोभित कर लज्जाविहीन स्वार्थपूर्ति का उपक्रम नही तो और क्या है?अब राजा राजवंश की कोंख से जन्म नही लेता तब भी वंशवाद राजवंश का पर्याय हो चला है । नगर को एक बार पुनः राजनीति की पारिवारिक दासता से मुक्त होने का अवसर मिलने वाला है अब जनता की जवाबदेही है कि उसे खुशहाल नगर चाहिए या दलाली युक्त कमीशन राज? परिवारवाद का पोषक चाहिए या बहुजन हिताय बहुजन सुखाय का सूत्रधार शुभचिंतक?जनमानस से इतनी आपेक्षा तो की ही जा सकती है।आने वाले निकट समय में जनमत स्पष्ट भी हो जावेगा ।किन्तु लच्छेदार भाषाणों और पारिवारिक भ्रमजाल से निकलजाना ही नगर के लिए बेहतर होगा । व्यक्तिगत व सार्वजनिक धन व सम्मान का हरण बंद होना चाहिए ।


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