मिथुन दा वाय प्लस श्रेणी सुरक्षा! भाजपा में आने के बाद क्या असुरक्षित होकर जिंदगी पर ‘‘खतरा’’ बढ़ जाता है?

इस देश के एक नहीं दो-दो प्रधानमंत्री जिन्हें देश की सबसे बड़ी सुरक्षा घेरा प्राप्त था, बावजूद इसके पद पर रहते हुए उनकी हत्या हो जाती है। “कड़ी सुरक्षा घेरा“ उपलब्ध होने के बावजूद भी जिंदगी सुरक्षित रह पाएगी, यह कहना थोड़़ा मुश्किल होगा। वास्तव में यह कहना ज्यादा उचित लगता है कि आज के इस सार्वजनिक व राजनीतिक जीवन में सरकारी स्तर पर सुरक्षा प्राप्त करना एक “संबल“ ऑफ स्टेटस बन गया है।

राजीव खण्डेलवाल :-          

‘‘मिथुन दा’’ कोलकाता के प्रसिद्ध ब्रिगेड परेड ग्राउंड में हुई ऐतिहासिक विराट रैली में ‘‘लौह पुरुष‘‘ प्रधानमंत्री की उपस्थिति में लाखों लोगों के सामने भाजपा में शामिल हुए हैं। यह तो स्पष्ट है कि मिथुन मोशाय को जो ‘‘वाय प्लस सुरक्षा श्रेणी‘‘ प्रदान की गई है, वह उनके वेटरन फिल्मी कलाकार होने की हैसियत से नहीं, बल्कि एक राजनेता के रूप में भाजपा में शामिल होने के बाद दी गई हैं। अर्थात पुरस्कार स्वरूप उन्हें “उपकृत“ किया गया है। इसके पूर्व फिल्मी कलाकार कंगना रनौत को भी वाय प्लस सुरक्षा श्रेणी उनके द्वारा मांगे जाने के बावजूद  राज्य सरकार द्वारा न दिये जाने के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने प्रदान की थी। यद्यपि वे  “राजनीतिज्ञ“ नहीं थी। तथापि उनके तीक्ष्ण बयान शायद केंद्र में बैठी सरकार को ‘‘सूट‘‘ कर रहे थे। इसलिए उनके जीवन की सुरक्षा पर खतरा मान कर उन्हें सुरक्षा प्रदान की गई। यद्यपि ‘‘कलाकार‘‘ की हैसियत से दाऊद या मुंबईया गुंडों की तरफ से उन्हें जान की कोई धमकी नहीं मिली थी, जिस कारण से ‘‘बयानवीर‘‘ व “पंगा कलाकार“ होने के पूर्व तक उन्हें सुरक्षा देने की आवश्यकता महसूस नहीं की गई थी।

प्रश्न उत्पन्न होता है कि भाजपा में शामिल होने के 72 घण्टे के भीतर ही मिथुन दा की जिंदगी पर ऐसा कौन सा खतरे का पहाड़ उत्पन्न हो गया, जिस कारण से केंद्रीय गृह मंत्रालय को उन्हें सुरक्षा देने का निर्णय लेना पड़ा। ‘‘70 बसंत‘‘ गुजार चुके  मिथुन चक्रवती, नक्सली आंदोलन से प्रभावित होते हुए, विभिन्न घाटों का पानी पीकर भाजपा में शामिल हुए है। तृणमूल कांग्रेस की ओर से राज्यसभा के सदस्य भी रह चुके हैं। इतने वर्षों के लम्बे जीवनकाल में उनके जीवन को कोई खतरा मुम्बई या पश्चिमी बंगाल में कभी पैदा नहीं हुआ था। एक कलाकार के रूप में भी और एक राजनैतिक व्यक्ति के रूप में भी। सामान्य रूप से .सुरक्षा देने के निजी विभिन्न सुरक्षा जॉच एजेंसीयों (आई बी, रिसर्च एंड एनालिसिस विभाग आदि) से मिले इनपुट के आधार पर राज्य सरकार व केन्द्रीय गृह मंत्रालय करता हैं। मिथुन दा द्वारा राज्य सरकार सेे ऐसी कोई सुरक्षा की मांग न तो की गई और न ही दी गई। कानून व व्यवस्था का प्रश्न आचार संहिता लागू होते ही चुनाव आयोग के अधीन हो जाता है। तब क्या चुनाव आयोग ने सुरक्षा देने की कोई सिफारिश की है, ऐसा सरकारी या गैर सरकारी स्तर पर कहीं भी कोई दावा नहीं किया गया है।

इससे यह स्पष्ट है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने स्वयं ही मिथुन दा के जीवन की सुरक्षा के खतरे का संज्ञान ले कर सुरक्षा प्रदान की है। इसलिए उनका यह दायित्व बन जाता है कि वह जनता को यह बताएं कि पिछले 72 घण्टो में मिथुन दा के जीवन पर खतरे से संबंधित क्या उन्हें महत्वपूर्ण व गंभीर इनपुट मिले थे? यदि उनका उत्तर हां में है तो, केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने अपने कर्तव्य का पालन किया हैं। (वैसे अपने आदेश के औचित्य के लिए कुछ न कुछ कारण गृह मंत्रालय को तकनीकि रूप से रखना ही पड़ेगा।) अन्यथा सुरक्षा देने के निर्णय को सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक आधार पर ही निर्णय लेना कहना क्या गलत होगा? अतः जब तक केंद्रीय गृह मंत्रालय आगे आकर अपनी स्थिति को स्पष्ट नहीं करता है, तब तक तो यही “परसेप्शन“ बना रहेगा।

इससे एक और महत्वपूर्ण बात उत्पन्न होती है कि, भाजपा जिसके मजबूत कंधों पर देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा का महत्वपूर्ण भार है, को वह बखूबी निभाते आ रही है। मतलब भाजपा के शासन में देश का नागरिक अपने को ज्यादा सुरक्षित महसूस करता है। वह इसलिए कि केंद्र व भाजपा शासित राज्यों में अन्य किसी भी पार्टी के शासन की तुलना में कानून और व्यवस्था की स्थिति बेहतर की है। ऐसा दावा स्वयं भाजपा भी करती आ रही है। तब मिथुन दा, जब तक भाजपा में नहीं आते हैं, उनकी जान को कोई खतरा नहीं होता है।  लेकिन भाजपा में आते ही मात्र 72 घण्टे के भीतर उनकी जान की सुरक्षा का खतरा इतना बढ़ जाता है, कि उन्हे व्हाय प्लस जैसी सुरक्षा श्रेणी देने का निर्णय (बिना मांगे) लेना पडता है और वह उसे स्वीकार भी करते हैं। यह “उलटबांसी“ क्यों? इसका क्या अर्थ निकलता है? आप खुद निकाल सकते हैं।

इसका शायद एक दूसरा पहलू यह भी हो सकता है कि सुरक्षा प्राप्त व्यक्ति को सिर्फ  दूसरों से होने वाले हमले और खतरे से ही नहीं बचाया जाता है, बल्कि उन्हें असुरक्षित व खतरों वाली जगह पर जाने से रोका भी जाता है। इस प्रकार सुरक्षा व्यवस्था में लगे सुरक्षा अधिकारियों का सुरक्षा प्राप्त व्यक्ति के मूवमेंट पर कुछ नियंत्रण अवश्य हो जाता है। चूंकि मिथुन दा फिल्मी कलाकार रहे हैं और वे स्व घोषित “कोबरा“ है। हो सकता है कि सुरक्षा व्यवस्था के माध्यम से मिथुन दा के मूवमेंट को कुछ नियंत्रित करने का उद्देश्य हो, ताकि वह हर कहीं अपनी “कला“ की “कलाकारी“ न दिखा दें। 

वास्तव में तो अच्छी कानून व्यवस्था होने का परिणाम तो यह होना चाहिए था कि पूर्व में  आईपी, वीआईपी, वीवीआइपी व अन्य लोगों (लगभग 450) को विभिन्न श्रेणी की सुरक्षा जो प्रदान की गई है, वह संख्या धीरे-धीरे कम होती जाती। परंतु यहां पर तो सिर्फ राजनीतिक आधार पर ही सुरक्षा घेरा कम-ज्यादा या हटाया जाता रहा है। महत्वपूर्ण शख्सियतांे के भाजपा में शामिल होने के बाद उन्हें अपने को ज्यादा सुरक्षित महसूस करना चाहिए या उन्हें जीवन का खतरा बढ़ जायेगा, यह एक नया “शोध“ का विषय ‘‘विश्लेषकों’’ के लिए हो सकता है।सुरक्षा लेने वाला व्यक्ति और सुरक्षा देने वाली अथॉरिटीज एक बात को भूल जाते हैं कि, इस देश के एक नहीं दो-दो प्रधानमंत्री जिन्हें देश की सबसे बड़ी सुरक्षा घेरा प्राप्त था, बावजूद इसके पद पर रहते हुए उनकी हत्या हो जाती है। और दूसरी तरफ देश के महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी किसी भी प्रकार की सुरक्षा लेने से इनकार करते हैं, बिना सुरक्षा के रहते हुए उनकी भी हत्या हो जाती है। मतलब साफ है। “कड़ी सुरक्षा घेरा“ उपलब्ध होने के बावजूद भी जिंदगी सुरक्षित रह पाएगी, यह कहना थोड़़ा मुश्किल होगा। वास्तव में यह कहना ज्यादा उचित लगता है कि आज के इस सार्वजनिक व राजनीतिक जीवन में सरकारी स्तर पर सुरक्षा प्राप्त करना एक “संबल“ ऑफ स्टेटस बन गया है। और हम देखते हैं इन महत्वपूर्ण व्यक्तियों (डिग्निटरीज) की सुरक्षा में लगे सुरक्षा कर्मचारियों का उपयोग वे किस तरह से करते हैं, यह बतलाने की आवश्यकता नहीं है। इसलिए इस देश में “राजनीति“ के लिए बहुत क्षेत्र पड़े हुए है। कम से कम सुरक्षा के क्षेत्र को तो “राजनीति का अखाड़ा“ मत बनाइए व उसे राजनीति से दूर रखिए।

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