कोरोना काल के ‘‘राष्ट्रीय आपदा’’ में रंगों से सराबोर मीडिया, शासन, प्रशासन व जनता!






 राजीव खण्डेलवाल:-

आज मस्ती व रंगों का त्योहार होली है। ‘‘बुराई‘‘ पर अच्छाई की ‘जीत‘‘ का प्रतीक ‘‘होली‘‘ है। आपको याद होगा पिछली बार जब होली आई थी, तब देश में कोरोना वायरस ‘‘शैशव काल‘‘ की स्थिति में था। देश में कोरोना वायरस संक्रमित प्रथम मरीज 30 जनवरी 2020 को केरल के त्रिशूर शहर में मिली थी, जो चीन की वुहांन यूनिवर्सिटी से आयी मेडिकल छात्रा थी। तत्पश्चात 25 मार्च को पहली बार संपूर्ण देश में लॉकडाउन लगाया जा कर बार बार बढ़ाया जाकर 69 दिन के लिये लागू किया गया था। 1 साल व्यतीत हो जाने के बाद हमारे देश में ‘‘कोरोना वायरस‘‘ ‘‘जीवन-मरण के उतार-चढ़ाव’’ के साथ आज वह ज्यादा ताकतवर होकर अपनी ‘‘जिंदगी‘‘ पर आए खतरे से ‘‘सचेत‘‘ होकर वह अपनी जिंदगी (जीवन) को मजबूती प्रदान करने में जी-जान से लग गया है। परंतु प्रायः हम नागरिक गण जिंदगी पर आयी इस घातक आशंका के ‘‘काले घनघोर बादलों‘‘ से ‘‘बेखबर‘‘ अपनी सामान्य जिंदगी को अभी भी ‘‘निर्बाध‘‘ रूप से जी कर "मृत्यु" की ओर बढ़ रहे हैं।

 आज देश में 68020 नए संक्रमित मरीजों की संख्या पाई गई। पिछले वर्ष अधिकतम कोरोना वायरस संक्रमित मरीजों की संख्या 97570 थी जो 11 सितंबर 2020 को थी। कोरोना की यह दूसरी, लहर पहली लहर से भी ज्यादा घातक बतलायी जा रही है। देश के प्रमुख चिकित्सक प्रसिद्ध मेदांता हॉस्पिटल के संस्थापक पद्मभूषण डॉ नरेश त्रेहान ( जिनके विरूद्ध इस हास्पिटल में हुई कुछ अनियमितताओं के चलते प्रथम सूचना पत्र दर्ज है) व कुछ अन्य डॉक्टरों का वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है, जिससे स्थिति की गंभीरता को समझा जा सकता है। 

 आज प्रायः पूरे देश में तेजी से बढ़ती कोरोना वायरस से संक्रमित की बढ़ती ‘‘चिंतित‘‘ करती संख्या को देखते हुए जनता की निर्बाध गति (मूवमेंट) को रोकने के लिये कहीं नाइट कर्फ्यू तो, कहीं आवागमन पर प्रतिबंध के साथ प्रायः सार्वजनिक स्थानों पर होली न जलाने और धुलंडी न मनाने से लेकर केंद्र व राज्य सरकारों ने और स्थानीय प्रशासन ने कमोबेश कुछ निर्देश जरूरी जारी किए हैं। जैसे बसों की आवाजाही पर पाबंदी, 10 बजे रात्रि बाद बाजार बंद आदि प्रतिबंध लगाये गये है। इन समस्त प्रतिबंधों का एकमात्र उद्देश्य जनता को घर में ही रहकर "उत्सव" मनाने के लिये मजबूर/सीमित करना है। 

        परन्तु प्रश्न यह पैदा होता है कि क्या ये निर्देश नागरिक गणों के साथ-साथ ‘‘मीडिया‘‘ पर लागू नहीं होते हैं? अथवा हमेशा की तरह मीडिया अपने को कानून से "ऊपर' मानता है? कल से ही मीडिया में होलीका उत्सव मनाये जाने के विभिन्न रंगारंग कार्यक्रम दिखाए जा रहे हैं। क्या मीडिया की जनता के प्रति "जिम्मेदारी" और सरकार के प्रति कोई ‘‘जवाबदेही‘‘ नहीं है?क्या मीडिया "गैर जिम्मेदार' व ‘‘संवेदनहीन‘‘ हो गया है? या मीडिया हाउस सहित मीडिया को चलाने वालों का दिमागी स्तर भी अन्यों के समान ‘‘खोखला‘‘ होते जा रहा है? क्या मीडिया विभिन्न स्थानों की रंगो की होली व होली संबंधित अन्य कार्यक्रम दिखाकर उन सभ्य नागरिकों को जो अपने का़नूनी व सामाजिक दायित्व का पालन करने के प्रयास में सार्वजनिक रूप से होली नहीं मना रहे हैं को, उत्तेजित नहीं करता है? क्या होली की न्यूज देना और होली के रंगारंग कार्यक्रम को दिखाना मे अंतर करना मीडिया को नहीं मालूम है? राष्ट्रीय शोक के समय हम समस्त नियमित कार्यक्रम रद्द कर देते हैं। इसी प्रकार कोरोना वायरस से उत्पन्न राष्ट्रीय आपदा के इस संकट के समय मीडिया की भूमिका तो और ज्यादा उत्तरदायित्व पूर्ण होने की आशा की जाती है। क्योंकि आज भी समाचारों व विचारों के संचार का सबसे मजबूत माध्यम शासन, प्रशासन, जनता और परस्पर जनता के बीच मीडिया ही है। बजाय कोई अन्य उंगली उठाए ,मीडिया को स्वयं के हित में और अपनी सार्थक उपयोगिता को बनाए रखने के लिए स्वयं का ‘‘आत्ममंथन‘‘ करना होगा।

प्रधानमंत्री (का ट्विटर हैंडल) से लेकर मुख्यमंत्री (शिवराज की दमोह में चुनावी सभा) मंत्रीगण व समस्त पाटियों के नेतागण कोरोना गाइडलाइन्स का पालन करने के लिये पर उपदेश कुशल बहुतेरे की तर्ज पर चुनाव में स्वयं ही गाइडलाइन्स की धज्जियां उड़ा रहे है, या उनके सामने धज्जियां उड़ रही है। ‘‘दिया तले अंधेरा’’। ऐसी स्थिति में जनप्रतिनिधी जनता के लिये ‘‘रोल माडल’’ बनने की बजाए स्वयं की नीतियों के लिये ही "रोक माडल" बन गये है। चुनावी राजनीति जो न कराया वह थोड़ा है