"नागरिकगण" लोकतंत्र के लिए या "लोकतंत्र" लोगों (नागरिकों) के लिए बना है?

 

 राजीव खंडेलवाल:- 

"अंडा पहले आया या मुर्ग़ी" यह बहस का मुद्दा हो सकता है। परंतु यहां पर इस सिद्धांत को लागू नहीं किया जा सकता है। यह स्पष्ट है, जैसा कि लोकतंत्र के बाबत पूर्व अमेरिकन राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने जो कहा है, वह आज भी शत प्रतिशत सही व उतना ही सामयिक व प्रामाणिक माना जाता है कि "लोकतंत्र जनता का, जनता के लिये और जनता के द्वारा शासन होता है"। कहा तो यहां तक जाता है कि "वाॅइस ऑफ द पीपुल इज़ द वाॅइस ऑफ गाॅड"। मतलब साफ़ है! जनता के समृद्ध जीवन,  व्यक्तिगत स्वतंत्रता  और जीने के अधिकार की स्वतंत्रता के लिये  श्रेष्ठ जनतांत्रिक  प्रणाली "लोकतंत्र" को अपनाया (चुनाव किया )  गया है  न कि लोकतंत्र का "अस्तित्व  बनाये रखने के लिए नागरिकों  का लोकतंत्र से जोड़ा जा कर इस्तेमाल किया गया है  (जोड़ा गया है)। परंतु कोरोना काल में "विनाश काले विपरीत बुद्धि" के चलते लोकतंत्र को बचाने के लिये "गण-तंत्र" अर्थात नागरिकों की सामूहिक "बलि" दी जा रही है। वह कैसे! इसे आगे समझते हैं।

             हमारे देश के "राजनैतिक कर्णधार" जिनके मजबूत कंधों और हाथों में देश की दिशा और अच्छे भविष्य के लिए निर्णय लेने का संवैधानिक अधिकार है, वे अपने गौरवशाली देश को विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश बनाये रखने की "दृढ़ इच्छाशक्ति"  के चलते राष्ट्रीय कोरोना आपदा काल में देश में संवैधानिक रूप से देय (ड्यू)  राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों व उपचुनावों को "नागरिकों" की जान माल की  क़ीमत पर भी कराने के लिये तत्पर हैं और चुनाव आयोग भी  सरकार का एक "टूल" बनकर चुनाव संपन्न करवा रहा है। इसी को कहते हैं "अशर्फ़ियां लुटें और कोयलों पर मुहर"। विगत कुछ दिनों से  देश में कोरोना महामारी  के संक्रमितों की संख्या, पिछले वर्ष से भी ज़्यादा तादाद में आने के कारण इसे संक्रमित महामारी का दूसरा दौर कहा जा रहा है। पहले चरण में जब कोरोनावायरस का संक्रमण हमारे देश में हुआ था, तब वह हमारे लिये  ही नहीं बल्कि विश्व के लिए भी  नयी संक्रामक बीमारी थी और तब बचाव के लिए न तो वर्तमान समान वैक्सीन (टीके) ही उपलब्ध थी और न ही प्रारंभिक अवस्था में उससे बचने के बाबत समस्त सावधानियों का ज्ञान पूरे देश में आम नागरिकों को था। आज हमने इन दोनों कमियों को पूरा करने के लिये कई आवश्यक क़दम उठाये हैं और बहुत हद तक पूरा भी किया है । अब हमने पहले से ज़्यादा अच्छे तरीक़े से इस "कोरोनावायरस संक्रमण" से निपटने के लिए न केवल हमारे देश के ढांचे को मज़बूत किया है, बल्कि अपने आप को "मानसिक" रूप से भी ज़्यादा "मज़बूत" किया है। बावज़ूद इसके, संख्या में पहले की तुलना में ज़्यादा तेजी से वृद्धि होकर आज एक दिन में लगभग डेढ़ लाख   व्यक्ति(1450384) संक्रमित  हो कर नित नये रिकाॅर्ड बना रहे हैं। जबकि पूर्व में अधिकतम संख्या एक लाख से नीचे की रही थी। क्या यह संख्या हमको चेतावनी (अलार्म) नहीं देती है ? क्या यह चिंताजनक संख्या हमें पहले से ज़्यादा सावधानी बरतने के लिये "चिंतित" कर और ज़्यादा प्रभावशाली  क़दम उठाने के लिए प्रेरित/मज़बूर नहीं करती है? शायद करती है ! इसीलिये सरकार सिर्फ "राजनीतिक क्षेत्र" को छोड़कर शेष समस्त क्षेत्रों  व दिशाओं में पहले से ज़्यादा सतर्कता  बरतने के और पालन करवाने के क़दम, "जान के साथ जहान" को बचाने के लिये उठा रही है। यहां इस "अपवाद" में "संपूर्ण राजनीतिक क्षेत्र' को इसलिये शामिल किया जा रहा है कि मामला सिर्फ चुनाव से संबंधित नहीं है। "आपत्तिकाले मर्यादा नास्ति" की उक्ति का अनुसरण करते हुए सरकार अस्थिर करने व गिराने से लेकर बनाने तक मैं(राजस्थान व मध्यप्रदेश की सरकारें)  कोविड-19 कहीं आड़े नहीं आया है।

              चूंकि हमारा देश  पूर्व में "राजाओं" के अधीन सदियों तक ग़ुलाम रहा है। अतः हमारे  शासकों और हम शासितों, दोनों में "वही" (राजा वाली) सामंतवादी मानसिकता कभी-कभी झलक जाती है। कहा जाता है "राजा कभी ग़लती नहीं करता है" और राजा पर कोई क़ानून लागू नहीं होता है। उसी "माइट इज़ राइट" की तर्ज़ पर वर्तमान में लोकतंत्र के राजा, राजनीतिज्ञ/ राजनेता होते हैं। क्योंकि वे राजनैतिक क्षेत्रों को ही प्रधानता देते हुए  काम करते हैं, व आगे बढ़ते हैं। इसलिए राजा की वह  मानसिकता हमारे वर्तमान  राजनेताओं के दिमाग़ों में शायद अभी भी विद्यमान है। इसीलिये उनका यह मानना है कि राजनीतिक क्षेत्र जिसके वे "राजा" हैं, का दूर-दूर तक कोरोना से कोई "लेना देना" नहीं है। मतलब कोरोनावायरस के संक्रमण के लिए राजनीति या राजनीतिक क्षेत्र कहीं भी ज़िम्मेदार नहीं है। यह बात अलहदा है कि कोरोना इन राजनेताओं को भी "मृत्यु का  ग्रास" बना रहा है। राजनेताओं की इसी सोच का ज्वलंत उदाहरण आपके सामने पांच राज्यों की विधानसभाओं के हो रहे चुनाव व कुछ उपचुनाव हैं। इसके पहले इसी संक्रमित कोरोना काल में बिहार में चुनाव संपन्न हो चुके हैं। हद तो तब हो गयी जब मध्य प्रदेश के 52 में से 51 ज़िलों में 3 दिन का लॉक डाउन लगा दिया गया, लेकिन बचे हुए एकमात्र ज़िले दमोह में लॉकडाउन सिर्फ इसलिये नहीं लगाया गया क्योंकि वहां पर उपचुनाव हो रहा है, जो लोकतंत्र को जीवित रखने की महती ज़िम्मेदारी को निभाने के लिये भी (यह उपचुनाव) "नितांत आवश्यक" है, और जैसा कि ऊपर उल्लिखित किया जा चुका है, राजनैतिक क्षेत्र से "धृणा" करने के कारण कोरोनावायरस को वहां पहुंचने से "परहेज़" है। अरे भाई दमोह जिले की समर्थ विधानसभा में उपचुनाव नहीं हो रहा है मात्र 1 विधानसभा दमोह में उपचुनाव हो रहा है लॉकडाउन से उन्मुक्त सिर्फ विधानसभा तक ही सीमित रखते? "सरकार की माया, कहीं धूप कहीं छाया"।  ये चुनाव संवैधानिक बाध्यता के बावज़ूद संवैधानिक रूप से ही स्थगित किए जा सकते थे, जैसे कि पूर्व में भी विभिन्न कारणों से  स्थगित हुए हैं। बिहार में तो आश्चर्यजनक रूप से आज के विपक्ष के नेता आरजेडी के अध्यक्ष तेजस्वी यादव और लोकजनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष चिराग पासवान, जो कि उस समय भी सत्ता में नहीं थे, बावज़ूद इसके, उनके द्वारा कोरोना काल में चुनाव स्थगन की मांग की थी। तेजस्वी यादव तो यहां तक ट्वीट कर गये थे कि "वे लाशों पर चुनाव करवाने वाले अंतिम व्यक्ति होंगे"। यह भारतीय राजनीति का एक बहुत ही सुखद एवं आश्चर्यजनक अपवाद था।                            

                 आपको याद होगा इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान वर्ष 1976 में 42 वें संविधान संशोधन विधेयक द्वारा लोकसभा का 5 साल का कार्यकाल बढ़ाकर 6 साल कर दिया था। अत्यंत संवेदनशील प्रदेश जम्मू कश्मीर में भी कई बार संवैधानिक रूप से चुनाव ड्यू होने के बावजूद तत्समय वहां मौजूद राजनीतिक स्थिति को देखते हुए संवैधानिक  संशोधन कर के छह छह महीनों के लिए कई बार चुनाव को बढ़ाया गया था। वहां 8 बार राज्यपाल शासन लागू किया जा चुका है। मतलब साफ है ! राजनीतिक दृष्टि से "राजनीति" के लिए और राजनीतिक कारणों से विधानसभा और लोकसभा के चुनाव की अवधि को तो बढ़ाया जा सकता है ,  लेकिन  नागरिकों की स्वास्थ्यरक्षा व प्राणरक्षा की दृष्टि से  लोगों के जीवन को बचाने के लिए चुनाव की अवधि नहीं बढ़ायी जा सकती है।  क्योंकि  एक तो हम विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश होने के घमंड में "चूर" हैं, और "हमारी आंखों में चुनाव की सरसों फूली हुई है"। हमारी नज़रों में लोकतंत्र की पहचान विभिन्न संवैधानिक व स्थानीय लोकतांत्रिक संस्थाओं के नियमित चुनाव संपन्न कराना ही हैं। दूसरे, यदि हमने  चुनाव की अवधि बढ़ा दी तो,  शायद हम पर आरोप लग जायेगा  कि हमने लोकतंत्र की हत्या कर दी है ; जैसा कि  1975 - 1977 में आपातकाल के दौरान लोकसभा चुनावों की अवधि  बढ़ाये जाने  के कारण  जनता पार्टी ने 1977 के चुनावों में इसे एक बड़ा मुद्दा बनाया था।  वर्तमान भाजपा तत्समय "जनसंघ" के रूप में जनता पार्टी का एक भाग थी।

               लोकतंत्र को बचाने के लिए या यह कहें कि और "मज़बूत" करने के लिए कोविड-19 की गाइडलाइंस, एपिडेमिक अधिनियम दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत जारी किए गए निर्देश आदि की पूरी तरह से धज्जियां उड़ा कर चुनाव करा कर आप नागरिकों को आर्थिक रूप से भी "मार" रहे हैं। इसे कहते हैं "घर फूंक तमाशा देखना"। अर्थात उन प्रदेशों के नागरिक भी जहां चुनाव नहीं हैं, लॉकडाउन लगाये जाने के कारण "आर्थिक मौत" की कगार पर हैं। (यहां जनसामान्य की बात की जा रही है) आपने दो दिन पहले पूरे प्रदेश में देखा होगा कि लॉक डाउन  प्रारंभ होने के पूर्व किस तरह की भीड़ कोविड-19 महामारी से पूरी तरह से "अंजान व बेपरवाह" होकर कोविड-19 को संक्रमित करने में सहायक हो रही थी , जिसके दुष्परिणाम  एक हफ्ते बाद ही सामने आ पाएंगे। अतः ऐसे लॉकडाउन लगाने का फायदा क्या? जिस संक्रमण को रोकने के लिए लॉकडाउन लगाया जा रहा है, उसके लगाने के पूर्व संक्रमित होने की भयंकर भयानक और भयावह स्थिति उत्पन्न होने से लॉकडाउन लगाने का उद्देश्य ही विफल होता जा रहा है। 

             मैं  फिर एक बार यही बात अंत में कहूंगा  कि  तीनों तंत्र- यथा शासन, प्रशासन और जनता, "ग़ैर-ज़िम्मेदारी की हद" को पार करते हुए स्वयं के साथ सबके जीवन के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। भारतीय लोकतंत्र की चुनाव-शक्ति की "जय" हो । वैसे कोरोना संक्रमण से बिल्कुल "मुक्त" चुनाव संभव है, यदि टी एन शेषन जैसा मुख्य चुनाव आयुक्त उपलब्ध हो? विद्यमान क़ानूनों के रहते हुए ही, अन्य किसी क़ानून की अतिरिक्त शक्ति प्राप्त किए बिना  टी एन शेषन ने  चुनावी भीड़, हुड़दंग, बाहुबली, काला धन और अनेकानेक धांधलियों  को किस प्रकार  रोक कर स्वच्छ व निष्पक्ष चुनाव करवाये गए थे , वह सब आपके सामने है। परंतु यहां पर फिलहाल इस दिशा में सरकार और चुनाव आयोग की इच्छा शक्ति की पूर्ण कमी परिलक्षित होती है। अन्यथा कोई कारण नहीं है कि जब स्व. इंदिरा गांधी अपनी कुर्सी बचाने के खातिर निजी "राजनैतिक स्वार्थ" हेतु लोकसभा का कार्यकाल एक साल के लिये आगे बढ़ा सकती थीं तो अभी तक तो देश के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री मोदी "राजनैतिक निस्वार्थ" के चलते "परमार्थ" हेतु विधानसभाओं के कार्यकाल बढ़ाकर चुनाव एक साल के लिये स्थगित क्यों नहीं किया?

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