क्या ‘‘(प्र)शासन’’/जनता किसी भी ‘‘कार्य’’/‘‘दायित्व’’ को पूरे ‘‘परसेप्शन‘‘ के साथ लागू न कर ‘‘गैर जिम्मेदार‘‘ तो नहीं होते जा रही हैं?

 क्या देश का ‘‘दिमाग‘‘ (बुद्धि) ‘‘दिवालियापन‘‘ की ओर तो नहीं जा रहा है?

राजीव खण्डेलवाल:-              

देश में कोरोना काल की राष्ट्रीय आपदा में शासन-प्रशासन, जनप्रतिनिधिगण और नागरिक गण (जिन नागरिको) पर उक्त तीनों तंत्र शासन करते हैं) इन तीनों के प्रतिनिधित्वों के दिमाग अधिकांशतः किस प्रकार खोखले होते जा रहे है, उसकी कुछ बानगी आगे बिंदुवार पढ़िये, जिसकी ‘‘वास्तविकता’’ पर दिमागी खोखलेपन से बचे हुए सम्मानीय लोग ही निर्णय ले, वही ज्यादा सही व सामयिक होगा।

1.कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए ‘‘रात्रि कालीन कर्फ्यू’’ की घोषणाः-क्या कोरोना वायरस निशाचार है? दिन में संक्रमित नहीं करता है?

2.रात्रि 10ः00 बजे बाजार और माल बंद करने के आदेश।ः-पहले से ही गुमास्ता कानून में नियत पूर्व निर्धारित समय पर दुकान बंद करने का प्रावधान है। फिर इस अतिरिक्त आदेश की आवश्यकता क्यो?

3.मध्य प्रदेश सरकार का रात्रि 10ः00 बजे के बाद बाजार बंद करने का आदेश के साथ शराब की दुकान 11ः30 बजे तक खुले रखने के आदेश।ः-कितना विसंगत और औचित्य पूर्ण?

4.कोरोना काल में बिहार में हुए आम चुनावों में शुरू शुरू में ‘‘वर्चुयल मीटिंग’’ का आयोजन। अब ऐसा लगता है कि पांच राज्यों मे हो रहे चुनावों में भीड़ भरी चुनावी सभाओं के लिए ‘‘अनुमति’’ चुनाव आयोग के बदले शायद ‘‘कोरोना वायरस‘‘ ने दी है, ताकि वह चुनावी समय में चुनावों में भाग लेने वाले प्रत्येक नागरिक पर कोई ‘‘आक्रमण‘‘ नहीं कर पाये? बदले में सरकार व चुनाव आयोग ने कोरोना वायरस को इन प्रदेशों में 1 साल और रह कर इन नागरिकों पर ‘‘शासन‘‘ करने की ‘‘अनुमति‘‘ प्रदान की है। काश आज टी.एन. शेषन की आत्मा चुनाव आयोग में अवतरित होती? 

5.प्रधानमंत्री के स्वयं के ट्विटर हैंड़ल से चुनावी रैलियों की फोटों का प्रदर्शनः- प्रधानमंत्री का नारा ‘‘जब तक दवाई नहीं तब तक ढ़िलाई नहीं’’। ‘‘दो गज की दूरी-मास्क है जरूरी’’। क्या ये संदेश उक्त फोटों ‘रैलियों’ के लिये नहीं है, जिन्हे प्रधानमंत्री स्वयं संबोधित कर रहे है। दवाई के साथ ढ़िलाई के बदले कड़ाई क्यों नहीं? रैली को संबोधन से इंकार क्यों नहीं? 

6.किसानों का दिल्ली-यूपी-हरियाणा आदि सीमाओं पर लम्बे समय से चला आ रहा आंदोलनः-आंदोलित किसानों द्वारा न कोई सावधानी और न ही कोरोना गाइडलाइंस के उल्लघंन पर उनके विरूद्ध कोई कार्यवाही। बल्कि टेबल पर बुलाकर सरकार की किसान नेताओं की ग्यारह राउंड तक बातचीत। सरकार की दृढ़ इच्छा शक्ति की कमी।

7.विश्व के सबसे बड़े क्रिकेट स्टेडियम अहमदाबाद के ‘‘नरेंद्र मोदी स्टेडियम’’ में भारत-इंग्लैंड के बीच खेले गए तीन टेस्ट मैच व दो टी-20 मैच में भारी क्रिकेट प्रेमियों की उपस्थिति साथ संपन्न हुए। भारतीय क्रिकेट बोर्ड और गुजरात सरकार के अनुरोध पर‘‘कोरोना वायरस छुट्टी पर‘‘ चला गया। परन्तु उसके छुट्टी से वापस लौटने पर क्रिकेट प्रेमियों को तत्पश्चात हुये बचे तीन टी-20 व वनडे मैचों को घर पर ही देखकर छुट्टी मनाने के निर्देश दिए गये।

‘शब को मय ख़ूब सी पी, सुब्ह को तौबा कर ली। रिंद के रिंद रहे, हाथ से जन्नत न गयी’’।

8.किसी नागरिक के संक्रमित हो जाने पर उसको घर पर ‘‘क्वॉरेंटाइन‘‘ किए जाने की स्थिति में उस घर को स्थानीय शासन द्वारा ‘‘सील‘‘ कर दिया जाता है। इसका एकमात्र उद्देश्य यह होता है कि संक्रमित रोगियों व उसके परिवार के सदस्यों के संपर्क से संक्रमण न फैले।ः-ऐसी स्थिति में उस परिवार के खाने-पीने और दवा-दारू लाने की क्या व्यवस्था होगी? सिर्फ स्थानीय शासन द्वारा मात्र यह अनाउंस कर देने से कि पड़ोसी लोग उनका ध्यान रखें, क्या व्यवस्था हो जाएगी, हो जाती है? और नहीं तो फिर घर का सदस्य जरूरतों की पूर्ति के लिए घर के बाहर तो निकलेगा ही। फिर सील करने की मात्र औंपचारिकता क्यों?

9.जो नये-नये छोटे कंटेनमेंट जोन बनाये जा रहे है, वो भी सिर्फ पेपर पर ही है। बेरीकेट लगाकर कंटेनमेंट जोन का फ्लेक्स भर लग जाता है। कंटेनमेंट क्षेत्र के आवागमन को प्रतिबंधित/नियंत्रित करने के लिए कोई प्रभावी कार्यवाही तो दूर कागज पर भी पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था लगाई जाने की व्यवस्था नहीं की गई है। इस प्रकार कागजों की खानापूर्ति भी ही नहीं हो रही है।

10.रेलवे विभाग द्वारा कोरोना काल में ट्रेन चलाने से लेकर टिकटों व किरायों के संबंध में बार-बार आधे-अधूरे, अदूरदर्शी, अस्पष्टता आदेश जारी किये गये। इसी तरह प्रवासी श्रमिक मजदूरों के संबंध में भी लिये गये निर्णय भी है। 

11.दुकानों पर एक साथ 5 ग्राहक से ज्यादा पर प्रतिबंधः- धरातल पर कितना व्यवहारिक?

12.बाजार बंद में दूध बंद, मदिरा चालूः- यह कैसा मजाक?

13.हवाई जहाज के अंदर कोई सोशल डिस्टेंसिंग नहीं,(बीच की सीट खाली नहीं रखी गई है) लेकिन एयरपोर्ट के लाउंज में या और कहीं बैठने की कुर्सियों पर सोशल डिस्टेंसिंग के निर्देश।ः-यह कैसी विसंगति? मुख्य न्यायाधीश की इस पर व्यंग्यात्मक महत्वपूर्ण टिप्पणी काबिले तारीफ हैः-‘‘आप कैसे कह सकते हैं कि बीच की सीटों पर यात्री बैठने संक्रमण नहीं फैलेगा? क्या कोरोना वायरस यह देखेगा कि ये एयर क्राफ्ट है और यहां बैठे यात्रियों को संक्रमित नहीं करना हैं?’’

14.बैठने की पूरी क्षमता के परमिट के साथ बसों का संचालन प्रारंभ करने की अनुमति।ः-6 फीट के सोशल डिस्टेंस का क्या होगा? क्या बसों में अंदर बैठने की व्यवस्था में आवश्यक परिवर्तन किए गए हैं?

15.शव यात्रा में 20-50 एवं वैवाहिक कार्यक्रमों में भागीदारों की संख्या 100-200 तक:- अन्य राजनीतिक व सार्वजनिक रूप से हो रहे सामाजिक, धार्मिक व अन्य कार्यक्रम सैकड़ों, हजारों लोगों की उपस्थिति के साथ बेरोकटोक हो रहे हैं। शोक के समय कम व खुशी के मौके पर ज्यादा लोगों की अनुमति। यह बुद्धि-विवेक का अकाल नहीं तो क्या है? मुझे याद आता है शायद बाबूलाल गौर के स्थानीय स्वशासन मंत्री होने के समय मध्यप्रदेश में मृत्यु की सूचना 7 दिन के भीतर व बच्चा पैदा होने की सूचना 21 दिन में नगरपालिका को देनी होती थी। उनके ध्यान में यह विसंगति लाये जाने पर मृत्यु की सूचना अवधि भी 21 दिवस कर दी गई। 

16.प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)में कपड़ा फाड़ होली के अवसर पर हुई एकत्रित भीड़ के संबंध में एक टीवी पत्रकार द्वारा वहां के मुख्य चिकित्सा अधिकारी से यह पूछने पर कि पिछले कुछ समय से प्रयागराज में तेजी से (लगभग 78 प्रतिशत) कोरोना में हुई वृद्धि के लिये यह भीड़ कितनी जिम्मेदार है तो, उनका विवेकहीन उत्तर था कि सही आॅनसर (जवाब) एक्सपर्ट/सांइट्सि (वैज्ञानिक) ही दे सकते है। इसका मतलब क्या यह नहीं निकलता है कि मास्क व 6 फीट की दूरी का कोरोना का संक्रमण रोकने के लिये कोई महत्व नहीं रह गया है? जिसे पूरा देश चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा है।

17.कोरोना वैक्सीन (टीके) के संबंध में व्यापक रूप से (ब्लैंकेंट) उम्र की सीमा का बंधन करने की सरकार की नीति क्या गलत नहीं है? क्या कोरोना संक्रमित व्यक्ति के परिवार को उम्र की सीमा से ‘‘परे’’ प्राथमिकता के आधार पर टीका नहीं लगाया जाना चाहिए?

18.क्या विभिन्न देशों को भेजी जाने वाली वैक्सीन की मात्रा में कुछ कटौती करके उक्त मात्रा को देश के बाजार में आम जनता के लिए नहीं उपलब्ध कराया जाना चाहिए था?

19.मुफ्त में 6 फुट की दूरी व मात्र कुछ रुपयों में मास की खरीदी कर सावधानी बरत कर  जिम्मेदार होकर जीवन को बचाने के बजाय लाखों रुपए खर्च कर संपत्ति बेचकर‘‘ईश्वर को प्यारे हो जाओ प्यारे‘‘। नागरिकों की यह कैसी ‘‘अकलमंद‘‘ मजबूरी?

20.सरकारी प्रेस विज्ञप्ति में कोरोना संक्रमित मरीजों के नाम का उल्लेख न होनाः-कितना औचित्यपूर्ण? एक तरफ प्रशासन पहचान छुपाने के लिये ऐसा कर रहा है तो, दूसरी तरफ उन मरीजों के घरों में बेरीकेट लगाकर चिन्हित कर पहचान बताई जा रही है। तब ऐसी आधी अधूरी मानसिकता लिये हुये निर्देशों का मतलब क्या?

21.केंद्रीय वित्तमंत्री ने छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज की दर घटाने के निर्णय के 12 (बारह) घंटे में ही निर्णय को पलटा। ‘‘विवेक’’ पहले था या बाद में? या अन्य कोई कारण या निर्णय के कारण चुनाव में ‘‘बारह’’ बजने की आशंका के चलते वापिस? विवेक की वापसी? 

22.मध्यप्रेदश के मुख्यमंत्री द्वारा मास्क लगाने के लिए जनजाग्रत अभियान की शुरूवात की गई जिसमें उन्होंने स्वयं अपने निवास पर पत्नी व बच्चों को मास्क लगाते समय सोशल डिस्टेंसिंग बनाये रख नहीं पाये। बल्कि मुख्यमंत्री के साथ इस अभियान में चलने वाले गाड़ियों का काफिला में भी सोशल डिस्टेंसिंग नहीं है। क्या मास्क लगाने वाले व्यक्तियों को 6 फीट की सोशल डिस्टेंसिंग से छूट मिलती है?

23.मध्यप्रदेश सरकार द्वारा सायरन बजाने का निर्देशः-कितनी व्यवहारिक उपयोगिता? अथवा या मात्र नौंटकी।

        इन कुछ एक उदाहरणों से यह स्पष्ट है की कोरोना काल में कोरोना वायरस के संक्रमण से निपटने के लिए समय-समय पर जारी किए गए निर्देश अव्यावहारिक, विसंगत पूर्ण व विरोधाभासी होकर स्वयं शासन प्रशासन की निर्देशों को लागू करने की दृढ़ इच्छा शक्ति की कमी‘‘ के चलते कागजों में ‘‘शोभायमान‘‘ होकर फाइलों की ‘‘खानापूर्ति‘‘ मात्र बने हुए हैं। का़नून के निर्माता व रक्षक ही का़नून का मजाक कर रहे है या करवा रहे है। इतनी ही, बल्कि इससे भी ज्यादा अधिकांशतः जनता भी दोषी है, जिनके हितों के लिए निर्देश जारी किए जाते है। परंतु जनता स्वयं के जीवन की रक्षा के लिए इन सुरक्षा निर्देशों का पालन करने के बजाए शायद ज्यादा ‘‘उल्लंघन‘‘ करने में ‘गर्व’ महसूस करती हैं। इसके साथ ही सरकार ‘‘शठे शाठ्यम समाचरेत‘‘ उक्ति का पालन नहीं करती या नहीं करना चाहती है। 

अतः ऐसे निर्देश जारी करने का औचित्य क्या रह जाता है? जिनका पालन न तो स्वयं नागरिक करते हैं, कर पाते हैं और न ही शासन या प्रशासन पालन करने या करवाने की स्थिति में  होते हैं। तो फिर ऐसे आदेशों को पेपर पर जारी करने से सिवाय ‘‘ठकुर सुहाती‘‘ करने और मीडिया की वाह-वाही प्राप्त करने के अतिरिक्त और क्या उपलब्धि होती है? इस एक वर्ष के कोरोना आपदा काल ने शासक व शासित (नागरिकगण) दोनों को असफल व गैर जिम्मेदार सिद्ध कर दिया है। 

अतः स्पष्ट है कि कोरोना राष्ट्रीय आपदा काल में शासन, प्रशासन व अधिकांश नागरिकों के स्तर पर देश का दिमाग कुंठ होकर दिवालियापन की ओर तेजी से बढ़ रहा है। अंततः उपचार के लिये हर संकट की घड़ी में रहा आशा का केन्द्र रहा उच्चतम न्यायालय ही रह जाता है। ऐसी स्थिति में उच्चतम न्यायालय ऐसी हालत का स्वंसज्ञान लेते हुए सरकार को एक ऐसा संवैधानिक संशोधन विधेयक संसद में पेश करने के निर्देश दें जिसमें ‘‘न्यायालय‘‘ को सरकार में एक सीमा से ज्यादा ‘‘विवेक‘‘ की कमी होने के आधार पर चुनी हुई सरकार को भंग करने की शक्ति प्राप्त हो। (विवेकमुक्त या विवेकयुक्त आधार का निर्णय न्यायालय ही करेगा) अथवा राज्यपाल की शक्तियों के समान सरकार को सस्पेंड कर कुछ समय के लिए राष्ट्रपति शासन लागू कर सकता है। क्योंकि ऐसे अविवेकशील निर्देशों-आदेशों की भरमार बढ़ती जाने के कारण एक चुनी हुई सरकार का जनता के प्रति जो दायित्व है, उसकी पूर्ति में सरकार असफल सी सिद्ध होती जा रही है। यही नहीं बल्कि एक तरह से वह एक ‘‘कानूनदा‘‘ नागरिक को कानून का उल्लंघन करने वाला व्यक्ति बनने की ओर ढ़केल रही है। लेकिन क्या ‘‘अपने हाथों अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने वाला‘‘ विधेयक कोई सरकार संसद में पेश करेगी?

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