पश्चिमी बंगाल के चुनाव परिणाम! भाजपा की "जय विजय" या "खतरे की घंटी"!

     

 राजीव खंडेलवाल :-
चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के जो चुनाव परिणाम आए है, स्वभाविक रूप से सर्वाधिक चर्चा पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों की ही है। तमिलनाडु, केरला, आसाम और पुडुचेरी के चुनाव परिणाम प्राय: कमोबेश अनुमानों के अनुकूल ही आए हैं। परंतु पश्चिमी बंगाल के चुनाव परिणाम अवश्य कुछ हटकर है।  इसकी व्याख्या "गिलास आधा खाली है अथवा आधा भरा है" दोनों तरीके से की जा सकती है। आइए! आगे इसका विश्लेषण करते हैं। 

             सर्वप्रथम "गिलास आधा भरा है", इस दृष्टि से परिणाम की व्याख्या करते हैं। 294 सदस्यीय (चुने हुए) विधानसभा मे भाजपा की पिछली बार मात्र तीन सीटें थी, जो आज के चुनाव परिणाम में बढ़कर 77  हो गई हैं। अभी तक किसी भी विधानसभा के चुनाव में शायद ही कोई पार्टी का कुल सीटों के प्रतिशत के हिसाब से सीटों में इतनी बड़ी  बढ़ोतरी 1%  से बढ़कर लगभग 25% हो जाना (बड़ी जीत दिखाने के "दर्शन" में 25 गुना भी कहा जा सकता है) कभी नहीं हुआ। यद्यपि वर्ष 1989 के लोकसभा चुनाव में भाजपा जरूर 2 से बढ़कर 85 सीटें प्राप्त की थी। इसलिए "आधा गिलास भरा है", यह कहकर भाजपा जरूर अपनी जीत के "ढिंढोरे" पीट कर  अपनी पीठ थपथपा कर संतोष व्यक्त कर सकती है। क्योंकि आजकल की राजनीति में तो लगातार 5 साल "असंतोष" से लड़ कर चुनाव परिणाम में "संतोष" पाने का ही तो प्रयास किया जाता है ? लेकिन राजनीतिक दृष्टि से और भविष्य की राजनीति को देखते हुए क्या वास्तव में यह भाजपा की जीत हुई है अथवा भाजपा इसे अपनी जीत बताना चाहेगी ? अथवा इसे हार मान कर इसके कारणों पर मंथन करना  चाहेगी, यह भाजपा के "नेतृत्व" पर निर्भर करता है। तथापि  राजनैतिक मजबूरी के चलते राजनीति के मैदान में "खेल के मैदान समान" कोई भी पार्टी अपने को हारा हुआ देखना/दिखाना नहीं चाहती है। इस दृष्टि से भाजपा पश्चिमी बंगाल में अपनी भारी जीत बता रही है तो, वह एक राजनीतिक दृष्टिकोण से ठीक ही है।

           अब बात "गिलास आधा खाली है" की चर्चा कर ले। चुनाव परिणाम का सही विश्लेषण करने के पहले दोनों पक्षों के जीत के "अनुमान के दावे" को जान ले। साथ ही 2 महीने की इस मैराथन चुनाव प्रचार में दोनों पार्टियों के लगे नेता गण, साधन संसाधन का आकलन भी जरूर करें। तभी आप परिणामों का सही निष्कर्ष पर पहुंच पाएंगे। स्वतंत्र भारत के इतिहास में शायद ही किसी राज्य के चुनाव में अभी तक देश का कोई भी प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की इतनी चुनाव रैलिया हुई हो, जितनी बंगाल के चुनाव में हुई। (शायद 100 से भी कहीं ज्यादा) अधिकांश केंद्रीय मंत्री, राज्यों  के भाजपा के अधिकांश मुख्यमंत्री गण, मंत्री गण, सांसद, विधायक, संगठन के पदाधिकारी गण और पार्टी के हजारों कार्यकर्ता गण  के साथ समर्पित संघ के स्वयंसेवक गण चुनाव के 6 महीने पूर्व से ही पूरे साधन संसाधन व जनशक्ति ( मेन पावर) के साथ पश्चिमी बंगाल के दूरस्थ अंचल तक पहुंचकर भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने के लिए जी जान से दिन-रात जुट गए थे। साधन और तैयारी के ऐसे उच्च स्तर की तुलना में  तृणमूल कांग्रेस भी क्या  उतनी  ही सक्षम व संसाधनों के साथ तैयार थी, कदापि नहीं। आईने समान आपके सामने स्थिति स्पष्ट है। हां यह बात जरूर है कि ममता बनर्जी का आत्मविश्वास व "तेवर" कभी भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कम नहीं रहा। तैयारी के उक्त सर्वोच्च स्तर के साथ अबकी बार "200 के पार" के साथ "2 मई दीदी गई" के नारों के साथ भाजपा के चुनावी दंगल में उतरने के बावजूद 200 पार के बजाएं ममता बनर्जी के चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर के 100 से कम भाजपा की जीत के आकलन के दावे को इस इस परिणाम ने सही सिद्ध कर दिया है। प्रशांत किशोर को  कुल आठ बार  विधानसभा एवं लोकसभा के  चुनाव में रणनीतिकार के रुप में  कार्य करते हुए  7 मे सफलता प्राप्त हुई है। पिछले लोकसभा चुनाव में  पश्चिम बंगाल में भाजपा 18 लोकसभा सीट सीटें जीती थी। तब भाजपा को कोई  121 विधानसभा क्षेत्रों में  बढ़ोतरी (लीड) मिली थी । विधानसभा के पिछले आम चुनाव की तुलना में  अबकी बार तृणमूल कांग्रेस के  कुल वोटों  के परसेंटेज में भी  लगभग 8% से ज्यादा की वृद्धि हुई है तथा पिछली विधानसभा में उसकी कुल सीटें 211 की तुलना में भी वृद्धि होकर 217 सीटें अभी आई है। यह स्थिति तब है, जब 10 साल से लगातार सत्ता में रहने के बाद सामान्यता एक एंटी इनकंबेंसी फैक्टर उत्पन्न हो ही जाता है। तब भी क्या इसे भाजपा की जीत कहां जाएगा या माना जाएगा?

      बंगाल में भाजपा के इस परिणाम के एक नहीं कई कारण हो सकते है। सबसे  सबसे महत्वपूर्ण एक कारण जो (अजीब सा है) लगता है, वह प्रधानमंत्री का "दीदी हो दीदी", "2 मई आई दीदी गई" को जिस व्यंग्यात्मक रूप से अपमानित करने के लहजे से लगातार संबोधन किया गया, उसको ममता ने स्वयं का अपमान बता कर बंगाल की अस्मिता से जोड़कर एक मुद्दा बना कर सहानुभूति बटोरने में सफल रही।  जो अंततः कुछ हद तक  जनता के गले उतर कर हार का कारण बन गया। दूसरा महत्वपूर्ण कारण बड़ी संख्या में दल बदलूओ को टिकट देना भी रहा है। यह इस बात से स्पष्ट है कि लगभग 80% टिकट पाने वाले दल बदलू (24 में से 19) चुनाव हार गए।

                   इस चुनाव परिणाम के कुछ अन्य महत्वपूर्ण पहलू भी उभर कर आए हैं, जो देश की राजनीति मैं दूरगामी प्रभाव डाल सकते हैं। प्रथम! पश्चिम बंगाल में वर्षों शासन करने वाली  राजनैतिक पार्टियां, पहले कांग्रेस फिर वाममोर्चा बुरी तरह से विफल होकर विधान सभा के अंदर स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पहली बार "शून्य" हो गयी हैं। दूसरे चरण से आठवें चरण तक पूरा चुनाव ममता बनर्जी ने व्हील चेयर से लड़ा और "परिणाम के दिन" व्हीलचेयर से बाहर निकल आई? आश्चर्यजनक रिकवरी? स्वास्थ्य की भी! "राजनीतिक पकड़" की भी! पश्चिमी बंगाल के चुनाव परिणाम का एक प्रभाव प्रदेश के बाहर राष्ट्रीय स्तर पर यह अवश्य पड़ा है कि भले ही देश में ऑक्सीजन का संकट विद्यमान हो, लेकिन इस जीत ने "मरणासन्न" अवस्था में पड़े विपक्ष को "ऑक्सीजन" मिलने से शायद विपक्ष की  "जिंदगी की ट्रेन राजनीतिक पटरी पर दौड़ने लग जाए" । जबकि मरणासन्न  विपक्ष ने "ऑक्सीजन" प्राप्त करने के लिए कोई "उठापटक" तक नहीं की, जिस तरह से हजारों मरीजों को करनी पड़ रही है। मतलब ममता की  "ममतामयी विजय" मे कोई सक्रिय उल्लेखनीय योगदान "विपक्ष' ने नहीं दिया।

             अब चर्चा ममता की नंदीग्राम में हुई "हार" की कर ले। वास्तव में नंदीग्राम में ममता की "बैलट की गिनती" में "हार" होकर  कर भी "राजनीतिक बुलेट" में जीत हुई है, वह कैसे ! आगे बिल्कुल स्पष्ट हो जाएगा। ममता बैनर्जी नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र से कभी भी चुनाव नहीं लड़ी है। शुभेंदु अधिकारी वहां की "माटी" के और जमीन से जुड़े हुए जन नेता रहे हैं, जिन्होंने नंदीग्राम में आंदोलन को लीड किया था । उनका  परिवार पिताजी शिशिर अधिकारी  जो पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री हैं, भाई दिवेंद्रु  सांसद व विधायक आदि अधिकतर लोग सांसद, विधायक, जिला परिषद आदि अनेक महत्वपूर्ण राजनैतिक पदों पर रहे हैं। इस प्रकार नंदीग्राम का "अधिकार" एक प्रकार से काफी समय से "अधिकारी परिवार' के पास ही रहा है । अतः शुभेंदु अधिकारी के जमीनी कार्य के कारण ही ममता को नंदीग्राम में सफलता प्राप्त हुई थी, जहां से ही तेजी से उनका कारवां आगे बढ़ा था। ममता बैनर्जी ने "स्वेच्छा" से पार्टी नेतृत्व की इच्छा के विपरीत  एक परिकलित (कैलकुलेटेड)  राजनीतिक रणनीति  के तहत योजनाबद्ध  रूप से शुभेंदु अधिकारी को "धोखा" के लिए सबक सिखाने की दृष्टि से "चुनौती" के रूप में यह जानते हुए भी कि नंदीग्राम शुभेंदु  अधिकारी का राजनीतिक रूप से मजबूत कार्य  गृह क्षेत्र  है, अपनी पारंपरिक विधानसभा छोड़कर नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया था। यही नहीं, अन्य नेताओं के समान  उन्होंने "संभावित हार" की जोखिम को शून्य करने के लिए दूसरी विधानसभा से चुनाव लड़ने से भी इंकार कर दिया था। इस निर्णय से उन्हें  दो तीन राजनीतिक फायदे जरूर हुए। प्रथम शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ  चुनाव लड़ने का झंडा गाड़ कर अपने "तेवर" के अनुरूप न केवल उन्होंने अपने नेताओं  व कार्यकर्ताओं के  उत्साह को बढ़ाया, बल्कि तत्समय जो तृणमूल नेताओं के स्तीफो की बाढ़ आ गई थी, उस पर भी रोक लगाने का प्रयास किया। दूसरी ओर ममता नंदीग्राम में भाजपा के शीर्षस्थ नेतृत्व का ध्यान कुछ ज्यादा  सीमित करने में सफल रही है । कभी अपने अभिन्न साथी रहे के द्वारा किए गए विश्वासघात को सबक सिखाना भी चुनाव लड़ने के पीछे प्रमुख उद्देश्य रहा।

               स्पष्ट है इन परिस्थितियों में राजनैतिक पंडितों की नजर में ममता की  "वोटों की यह "हार' भी राजनीति की जीत" ही है।  ममता का यह कदम ठीक वैसे ही है कि बारामती विधानसभा क्षेत्र में (जहां शरद पवार कभी भी नामांकन  भरने के बाद परिणाम आने तक प्रचार करने नहीं जाते) उनकी मांद में जाकर चुनाव लड़ना, राजनीतिक दुस्साहस का कदम ही कहलायेगा । ममता राजनीति में ऐसी "दुस्साहस' के लिए जानी जाती रही है। ऐसी स्थिति में हार जीत "अप्रधान" निरर्थक हो जाती है। कल्पना कीजिए ! यदि अकेली ममता बनर्जी पर 294 सीटों की जिम्मेदारी नहीं होती और वह मात्र एक उम्मीदवार के रूप में (मुख्यमंत्री के रूप में नहीं) नंदीग्राम से चुनाव लड़ती  तो आए परिणामों को देखकर  उस स्थिति में ममता  को नंदीग्राम से हराना नामुमकिन होता ? कोई भी व्यक्ति का इसके विपरीत दावा करना मुश्किल होता ।

               अंत में इस चुनाव परिणाम का एक संकेत यह भी  निकलता है कि  भारतीय जनता पार्टी के लिए सबसे जिताऊ व्यक्तित्व  देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा इस परिणाम ने कुछ "मलिन" जरूर किया है। बात बात में हर चुनावी जीत की सफलता का श्रेय नरेंद्र मोदी को देने वाले पार्टी के नेताओं को तो सांप ही सूंघ गया। राजनीति में तो  श्रेय व   अपशय दोनों को स्वीकार करने वाला नेता ही सफल व महान कहलाता है।  गला फाड़ फाड़कर  यह  बतलाया जा रहा है कि यह विधानसभा के चुनाव थे, लोकसभा के नहीं । इसमें नरेंद्र मोदी की हार का प्रश्न कहां से उत्पन्न हो गया। परंतु क्या यह सच नहीं है कि बंगाल में वोट मोदी के नाम से नहीं मांगे गए क्योंकि मोदी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं थे। भाजपा नेताओं के कथन को मान भी लिया जाए तो, इस बात को तो सभी को मानना ही पड़ेगा कि अब सिर्फ मोदी का चेहरा  "जिताऊ" नहीं रह गया है। बंगाल के चुनाव का शायद कुछ कुछ संदेश यही है। 

"जॉय बंगला" !"खेला होबे"! बधाई! परंतु "खेला परिवर्तन (न) होबे"?

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