‘‘रेमडेसीविर‘‘ इंजेक्शन क्या ‘‘जीवन रक्षक‘‘ दवाई है?


वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जीएसटी कॉउन्सिल की हुई बैठक में लिए गए निर्णयों की जानकारी देते हुए यह बतलाया कि एंबुलेंस, सैनेटाइज़र, सर्जिकल ऐपरेटस जैसे ऑक्सीमीटर वेंटीलेटर और कुछ दवाइयों जैसे ब्लैक फंगस की दवाइयों पर जीएसटी के रेट कम किए हैं या ‘‘शून्य‘ कर दिए हैं। रेमडेसिविर दवाई पर भी दर घटाकर 5 % कर दी गई है। सरकार के इन निर्णयो के प्रकाश में थोड़ा सा सरकार की ‘‘दृष्टि‘‘ (विजन) ‘‘दूरदृष्टि‘‘ और ‘‘लेटलतीफी‘‘ पर भी नज़र ड़ालने की आवश्यकता हैं। इसके लिए विपक्ष भी उतना ही जिम्मेदार है क्योंकि "जीओएम" सिफारिश को जीएसटी काउंसिल जिसमें विपक्ष के मुख्यमंत्री भी शामिल हैं, ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया है

      रेमडेसिविर एक ‘‘एंटी वायरल‘‘ दवा है, जिसकी खोज प्रारंभ में ‘‘हेपेटाइटिस सी‘‘ के लिए की गई थी। आरएसवी (सांस संबंधी) का इलाज करने में भी उसका उपयोग होता था। लेकिन इसे प्रसिद्धि ‘‘इबोला‘‘ बीमारी के इलाज के कारण मिली थी। आप जानते हैं स्वास्थ्य की सर्वोच्य संस्था आईसीएमआर ने रेमडेसीविर दवाई को जीवन रक्षक दवाई घोषित नहीं किया है और न ही ‘‘रामबाण दवाई‘‘ माना है। ‘पटना एम्स के निदेशक ने उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान यह जवाब दिया कि रेमडेसिविर इंजेक्शन कोरोना के लिए नहीं है और केंद्र की कोविड प्रोटोकॉल की गाइडलाइंस में भी इसको शामिल नहीं किया गया है। ‘एम्स‘ दिल्ली के डायरेक्टर डॉ रणदीप गुलेरिया ने कहा कि यह कोई जादू की ‘‘गोली’’ नहीं हैं और न ही अभी तक कोई ऐसा कोई ठोस प्रमाण मिले है जिससे इसके इस्तेमाल से मृत्यु में कमी आ जाती हैं यह इसे ज्यादा कारगर नहीं बतलाया है। नालंदा मेडिकल कॉलेज के अधीक्षक ने लिखित में डॉक्टरों को यह निर्देशित किया हैं कि डॉक्टर रेमडेसीविर इंजेक्शन का प्रिस्क्रिप्शन न लिखें। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी 20 नवंबर 2020 को एक एडवाइजरी जारी कर यह स्पष्ट किया था कि कोविड-19 के लिए यह दवा प्रभावशाली नहीं है व इसके इस्तेमाल से बचना चाहिए। 

इतने तथ्यों के साथ अभी तक के अनुसंधान से एक अधिकतर मान्य निष्कर्ष यह निकला है कि रेमडेसिविर के उपयोग से नुकसान ज्यादा है और कोई खास आराम या फायदा नहीं होता है। इसके इसके उपयोग करने से फेफड़ों, किडनी व यकृत (लीवर) में विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। तब ऐसी दवाई रेमडेसिविर पर जीएसटी की दर कम करने का औचित्य और फायदा क्या? इस तरीके से सरकार एक तरह से रेमडेसिविर के उपयोग को बढ़ावा ही दे रही है। जबकि उपरोक्त स्थिति को देखते हुये इसके उपयोग को हतोत्साहित करने के लिए जीएसटी की दर कम करने के बजाय बढ़ा देनी चाहिए थी। इस प्रकार रेमडेसिविर इंजेक्शन पर जीएसटी की दर में कमी का निर्णय सरकार की  ‘‘दिशाहीनता और अददूरदर्शिता‘‘ को ही दर्शाता है।

      अब बात उक्त ‘निर्णय‘ के  समय (टाइमिंग) को लेकर कर ले। कोविड-19 महामारी के ‘‘दो दौर‘‘ के कुल लगभग 15 महीने गुजर चुके हैं। 2.95 करोड़ से ऊपर व्यक्ति संक्रमित और 3.74 लाख से ज्यादा व्यक्तियों की मृत्यु हो चुकी है। उक्त भयंकर दुष्परिणामों से गुजरने के बाद आज जब संक्रमण और मृत्यु की संख्या व दर में बेहद कमी आ गई है, तब क्या सरकार तीसरे दौर का अगाह करते हुए उससे निपटने की तैयारी कर रही है, के रिस्पांस (उत्तर) में तो सरकार ने जीएसटी की दरें ‘‘कम‘‘ तो नहीं की है? यदि ऐसा है तो सरकार की उक्त ‘‘नीति‘‘ को उचित व सही सिद्ध (जस्टिफाए) करने के लिए कोरोना वायरस को अपना रूप बदलकर म्युटेंट के साथ नए वेरिएंट्स के रूप में अपना ‘‘विकराल‘ रूप दिखाना होगा? ताकि तब हजारों संक्रमित होने वाले व्यक्तियों को इन दवाइयों के प्रयोग करने की स्थिति में कम हुई जीएसटी की दर से कुछ फायदा मिल सकेगा? नागरिको को फायदा पहुंचने का ऐसा दावा सरकार तभी कर सकेगी?

           आखिर सरकार के पास इस बात का कोई जवाब है क्या कि जब देश में संक्रमण उच्चतम स्तर पर था, तब इस महामारी से बचाव के लिए उपयोग की जाने वाली दवाइयों पर जीएसटी की दर शून्य क्यों नहीं की गई? दूसरी बात ‘‘भूतलक्षी प्रभाव‘‘ से यह छूट क्यों नहीं दी गई। और कोई प्रभावी मेकैनिज्म (नियम) बनाकर उपभोक्ता तक उक्त छूट को पहुंचाया जाता? अप्रत्यक्ष कर प्रणाली जिसके अंतर्गत जीएसटी आता है का एक सामान्य सिद्धांत है कि जब भी ‘‘दरें बढ़ाई‘ जाती हैं तो वह या तो तुरंत अथवा ‘‘प्रास्पेक्टिव प्रभाव‘‘ (भविष्य) से लागू होती है। लेकिन दर में यदि कोई कमी या छूट दी जाती है तो, यह छूट ‘भूत’, वर्तमान (तुरंत) या ‘‘भविष्य के प्रभाव से देना सरकार के विवेक पर निर्भर करता है। यदि सरकार अंतिम उपभोक्ताओं (मरीजों) को फ़ायदा देना चाहती तो वह छूट ‘‘भूतलक्षी प्रभाव‘‘ से दे सकती थी। सरकार के उक्त निर्णय में इस ‘‘विजन‘‘ की कमी निश्चित रूप से दिखती है। ब्लैक फंगंस से लड़ने की दवा एम्फोटेरिसिन व टोसली जुमैब को कर मुक्त कर दिया गया। जिनकी रोगियों की संख्या तुलनात्मक रूप से बहुत कम है। परन्तु वैक्सीन जिसे वैश्विक स्तर सहित स्वयं सरकार ने कोविड-19 से लड़ने के लिए प्रभावी अस्त्र माना है, के अनुसंधान के लिए सरकार ने कंपनीज को करोड़ों रुपए भी दिए हैं। इस पर जीएसटी की दर 5 % से घटाकर शून्य न करने के लिये यह बतलाया गया कि 75% वैक्सीन केंद्र खुद खरीद कर रहा है। सरकार का वैक्सीन पर जीएसटी की दर के संबंध में यह रुख को हमेशा जनोंमुखी लोकोपयोगी नीति लागू करते दिखते रहने के ‘‘परसेप्शन" के विरुद्ध सा दिखता है। राजनैतिक रूप से यहां पर सरकार से शायद ‘‘चूक‘‘ हो गई है, जिसका फायदा वह ले सकती थी। यदि ऐसा हो जाता तो ‘‘मीडिया‘‘ की सुर्खियां इस प्रकार की होती ‘‘जीवन रक्षक वैक्सीन को सरकार ने कर मुक्त कर दिया‘‘।

         कुछ शुभचिंतकों को ‘‘देर आए दुरुस्त आए‘‘ की तर्ज पर सरकार की उक्त घोषणा पर बधाई देने में भी तकलीफ हो सकती है। क्यांकि वर्तमान में ‘देर‘ का अस्तित्व तो दिख रहा है, लेकिन यह देर आयद दुरुस्त आयद की ‘‘दुरुस्ती‘‘ दो लाख से अधिक लोगों की मृत्यु के बाद आई है, जो नीति पर एक प्रश्नवाचक चिन्ह स्वयं में लगा देती हैं।

      इस अवसर पर सरकार को एक सुझाव देना चाहता हूं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं यह कहा है कि यह महामारी पिछले 100 वर्ष की सबसे बड़ी वैश्विक महामारी कोविड-19 है जिसने सबसे अधिक जान माल का नुकसान पहुंचाया। ऐसी स्थिति में इस महामारी से निपटने के लिए एक केंद्रीय ‘‘कोविड-19 मंत्रालय‘‘ की स्थापना क्यों नहीं की जानी चाहिए? जिस प्रकार वर्ष 1995 में स्वास्थ्य विभाग से हटाकर "माचिप एवं हो." विभाग जिसका नाम वर्ष 2003 में बदलकर आयुष विभाग कर ‘‘अन्य पैथी‘‘ के इलाज के लिए स्थापना की गई थी। उसी प्रकार स्वास्थ्य विभाग से कोविड-19 को हटाकर कोविड-19 के लिए एक पृथक मंत्रालय की स्थापना की जाने की वर्तमान स्थिति को देखते हुए नितांत आवश्यकता हैं। ताकि उस पर पूरा ध्यान केंद्रित (कंसंट्रेट) कर प्रभावशाली नीति बनाकर प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जा सके। यह असली और भी ज्यादा आवश्यक है क्योंकि वर्तमान में कोविड-19 के लक्षण से लेकर बचाओ तक सावधानियों से लेकर दवाइयों तक टेस्टिंग से लेकर मृत्यु दर्द तक प्रत्येक मामले में अनिश्चितता बनी हुई है जैसा कि मैंने पूर्व में एक लेख में लिखा था भी था।  "ट्रायल एंड ईरर" की स्थिति अभी भी विद्यमान है। आपने देखा है की इस आपदा काल में अधिकतर अस्पतालों में कोविड-19 को छोड़कर अन्य गंभीर बीमारियों की भर्ती व इलाज बंद कर दिए गए थे। इस कारण से अन्य बीमारियों के लिए स्वास्थ्य सेवा चरमरा गई थी। भोपाल के भोपाल गैस पीड़ित अस्पताल द्वारा हाल में ही जारी सूचना में यह बताया गया है की कोविड-19 के प्रकरण घटने के कारण अब अन्य जोखिम भरी गंभीर बीमारियों के इलाज अस्पताल में प्रारंभ हो सकेंगे। अर्थात कोविड आपादाकाल की चरम स्थिति में बंद कर दिये गये थे। इसलिए कोविड-19 के लिए प्रथक मंत्रालय बन जाने पर समस्त प्रकार की बीमारियों का इलाज एक साथ सही रूप में होने के लिए सही नीति ‘‘मंत्रालय‘‘ के स्तर पर बन पाएगी।

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