तनाव’’, ‘‘कारण-निवारण’’!
राजीव खण्डेलवाल:-
विगत समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कई प्रमुख अनुषांगिक क्षेत्रों में एक शाखा ‘‘आरोग्य भारती’’ के एक वेबिनार कार्यक्रम में मुझे उक्त विषय पर बोलने का अवसर मिला। उद्बोधन का सारांश आपके साथ साझा कर रहा हूं। वह इसलिए कि मुझे उम्मीद है कि इससे आपकी ‘‘जानकारी के भंडार’’ में और वृद्धि होगी। 
आखिर ‘‘तनाव’’(स्ट्रेस), क्या है? इसकी ‘पहचान’ (लक्षण) क्या हैं? इसकी ‘उत्पत्ति’ के क्या कारण हैं? इसके उपचार क्या हैं? इसके ‘परिणाम/दुष्परिणाम’ क्या हैं, हो सकते हैं? यह सब एक बहुत ही वृहद विषय है, जिस पर मात्र एक घंटे के सेमिनार में पूर्ण चर्चा संभव नहीं हैं। (टेंशन’’ व एंजाइटी’’ इसके आगे की स्थिति हैं।)मतलब तीनों स्थितियां अलग है। परन्तु यहां पर मैं सिर्फ़ तनाव के लक्षण, कारण,परिस्थितियां और एकाध उपचार के संबध में चर्चा करूंगा। 
      दैहिक आधार पर हैंस शैले ने ‘तनाव’ शब्द को खोजा व इसे शरीर की किसी भी आवश्यकता के आधार पर अनिश्चित प्रतिक्रिया के रूप में परिभाषित किया। वैसे ‘‘तनाव’’ का शाब्दिक अर्थ होता है ‘‘खिंचाव’’। जिस प्रकार किसी रबड़ का खिंचाव होता है और यह खिंचाव जब तक टूटने की कगार पर नहीं आ जाता है, तब तक जीवन भी सुरक्षित रहता है। अन्यथा इसका परिणाम ‘‘आत्महत्या’’ अथवा ‘मस्तिष्काघात’ के रूप में सामने आ सकता है। वैज्ञानिक दृष्टि से तनाव (स्ट्रेस) किसी भी बदलाव के साथ सामांज्यस बिठाने के लिये शरीर द्वारा की गई एक प्राकृतिक प्रतिक्रिया है। शरीर चुनौतियों से सामना करने के लिये स्वयं को तैयार करने के लिये शरीर में विभिन्न रसायनों जैसे काँटिसोल, एड्रेनालाईन इत्यादि को बढ़ाने लगता है। हमारा शरीर शारीरिक, मानिसक व भावनात्मक इन रूप से इन बदलाव पर प्रतिक्रिया करता है। तनाव के लक्षण जो सामान्यतः सबकी जानकरी में होते है वे मुख्य रूप से एकाग्रता में कमी, कमजोर स्मरण शक्ति संवेदनशील या आक्रमक होना निष्क्रिय, विचलित, प्रेरणा-सर्म्पण-आत्मविश्वास में कमी, घबराहट, चिड़चिड़ापन, असहजता, चिंता आत्महत्या के विचार आदि मानसिक व कार्यात्मक लक्षण होते हैं। शारीरिक लक्षणों (व्यवहारिक प्रभाव) के विकारों के रूप में उच्च रक्तचाप, डायबिटीज बालों का झड़ना, गठिया सिर दर्द, सांस लेने में दिक्कत, रोक-निरोधक क्षमता में कमी अत्याधिक धू्रमपान, दिल का धड़कना व श्वसन बढ़ना, पसीना आना, हाथ कांपना, अचानक वजन कम या ज्यादा होना, दात पीसना, नींद में गडबड़ी, अपच, सेक्स की इच्छा में कमी इत्यादि लक्षण हो सकते है। हैंस शैले ने दो प्रकार के तनावों की कल्पना की। प्रथम कॉटिसोल जब तनाव झेलते हुये व्यक्ति इतना आदी हो जायेगा कि वह उसे महसूस ही न कर पाता हो, तब ऐसे तनाव को ‘यूस्टेªस’ कहा जाता है। दूसरा डिस्ट्रेस (विपत्ति) जो बुरा संक्रमित व अतार्किक व अबोधित तनाव है। एक अध्ययन के अनुसार हमारे देश में प्रत्येक 4 व्यक्तियों में 1 हर साल तनाव के चपेट में आ जाता है।    
सामान्यतया अधिकांश नागरिकों के जीवन में ‘‘तनाव’’ एक आवश्यक तत्व होता है। इसके बगैर जिंदगी की कल्पना नहीं की जा सकती है, क्योंकि यह सामान्य व्यक्तित्व विकास के लिये आवश्यक होता है। परंतु वर्तमान में लोग इसे ‘‘आवश्यक बुराई’’ (नेसेसरी ईविलस्) के रूप में ज्यादा समझते हैं। परंतु यह भी उतना सच नहीं है, क्योंकि ‘‘तनाव’’ के संबंध में ऐसी स्थिति हमेशा नहीं होती है। कुछ हासिल करने के लिये चिंता करना निश्चित रूप से आपको अपने लक्ष्य की ओर ले जाता है, लेकिन चिंताओं का सीमा से ज्यादा बढ़ना, तनाव का रूप ले लेता है। और इस सीमा को इन जनरल सीमा में बांधा नहीं जा सकता है। यह सीमा प्रत्येक व्यक्ति की अलग-अलग होती है। 
तनाव सिर्फ मानसिक ही नहीं होता है, बल्कि शारीरिक भी होता है। यूं कहना चाहिये कि ये दोनों एक दूसरे के सम्पूरक होते हैं। जीवन में ‘‘तनाव’’ के कई प्रकार, प्रकृति व कारण होते हैं। बच्चे, युवा, प्रौढ़ व वृद्ध सबके तनाव की प्रकृति और कारण यद्यपि अलग-अलग होते हैं, लेकिन प्रत्येक आयुवर्ग का तनाव कुछ पारस्परिक संबंध लिये भी होते हैं। जैसे बच्चों में तनाव का मुख्य कारण शिक्षा व परीक्षा के भार का होना है, लेकिन अपने अभिभावकों की अपेक्षाओं के कारण यह तनाव द्विगुणित हो जाता है। यद्यपि परीक्षा के तनाव के समय में पूर्व में एक विस्तृत लेख मैं लिख चुका हूं। युवा अपने भविष्य को संवारने और अच्छी दिशा देने के प्रयास में पढ़ाई पूरी कर रोजगार और रोजी रोटी के लिए सतत् लगे होने के कारण तनाव में है। इसके विपरीत माता-पिता भी बच्चों के भविष्य को लेकर तनाव में रहते हैं। प्रौढ़ व्यक्ति अपने परिवार और समाज के प्रति जम्मिेदारियों को अच्छी तरह से निभाने के साथ-साथ ‘‘गलाकाट प्रतिस्पर्धा’’ के इस युग में दौड़ में बने रहने के लिये अक्सर ‘‘चादर से बाहर पांव निकलने के कारण’’ उत्पन्न चिंता से तनाव में है और वृद्ध व्यक्ति के तनाव का कारण उसकी वृद्धावस्था है। वैसे कई बार वृद्धों की मानसिक स्थिति भी बच्चों समान हो जाती है।
विभिन्न काल में भिन्न-भिन्न परिस्थितियों होने के कारण तनाव के कारण और निवारण भी विभिन्न हो जाते हैं। वर्तमान 21वीं सदी में वैसे तनाव का सीधा संबंध ‘‘नदी नाव संयोग की भांति’’ लक्ष्य निर्धारण् या टारगेट से होता है। मानव को जीवन की प्रत्येक अवस्था में एक अच्छा नागरिक बनने और एक अच्छे जीवन निर्वाह करने की जिजीविषा लिए एक सामान्य सोच जो प्रायः हर मानव की होती है, को पूरा करने के लिए वह ‘‘अपनी नाव सुविधाजनक रूप से ख़ुद खेने की क्षमता अनुसार’’ लक्ष्य निर्धारित करता है और उसे यथासंभव प्राप्त करने का प्रयास करता है। इस पूरी प्रक्रिया में अधैर्य के कारण उत्पन्न असंतुलन ही तनाव को जन्म देता है। अधीर व्यक्ति यह भूल जाता है कि ‘‘रोम वाज़ नॉट बिल्ट इन ए डे’’। अतः जो व्यक्ति इस पूरी यह प्रक्रिया में धैर्य पूर्वक संतुलन बनाए रखता है, वह बिना तनाव के श्रेष्ठ जीवन जीता है। ‘‘धैर्यधना हि साधवरू’’ अर्थात सज्जन व्यक्ति का धैर्य ही धन होता है। 
लेकिन प्रश्न यही है कि यह संतुलन कैसे बनाया जाये और उसे क़ायम रखा जाये। एक सामान्य बुद्धि वाले व्यक्ति के लिए यह निर्धारण करना बहुत मुश्किल होता है। फिर भी अपनी क्षमता अनुसार अपने जीवन के लिये एक उचित टारगेट को निश्चित करना एक अच्छी शुरुआत मानी जा सकती है, जिससे तनाव की स्थिति न बन सके। और जैसा कि कहा जाता है ‘‘वेल बिगन इज़ हाफ डन’’, यह बहुत ही आदर्श स्थिति होती है, जो सामान्यता हर व्यक्ति में नहीं पाई जाती। लेकिन आप इस समस्या से पार जरूर पा सकते हैं, यदि आप समय-समय पर स्वयं द्वारा निर्धारित लक्ष्य और उसके लिए किए जा रहे प्रयासों की समीक्षा करें। यदि लक्ष्य क्षमता से ज्यादा निश्चित हो गया है तो, उसे तदनुसार कम करें। ‘‘सर सलामत तो पगड़ी हज़ार’’, और यदि प्रयास में कुछ कमी दिख रही है तो उस लक्ष्य की ओर ज्यादा प्रयास बढ़ायें। ’’नहीं’’ कहना सीखे या चीजे बदल न सके तो उसे ’’स्वीकार’’ करना सीखें। हर स्थिति में आपका प्रबल आत्मविश्वास अत्यंत आवश्यक है। याद रखें ‘‘प्योर गोल्ड इज़ नॉट फ़ियर द फ़लेम‘‘। ऐसी स्थिति में आप तनाव की स्थिति की ओर जाने से बच सकेंगे। अब आप समझ गए होंगे; तनाव का उपचार ध्यान-योग, व्यायाम, प्राकृतिक चिकित्सा, सही पोषण, आर्युवेदिक चिकित्सा, व दवाइयों से बेहतर इलाज, तनाव उत्पन्न ही न होने देना है।
      65 वर्ष की उम्र तक सामान्य व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों और दायित्वों को पूर्ण कर मुक्त हो जाता है। इसलिए तनाव की स्थिति इसके पूर्व ही रहती है। इसके बाद निश्चित रूप से सीनियर सिटीज़न तनाव रहित जीवन जी सकता है, यदि वह यह तय कर ले कि अब उसे परिवार, समाज, सार्वजनिक, व्यवसायिक आदि किसी भी क्षेत्र में अब कोई भी लक्ष्य निर्धारित करने की आवश्यकता नहीं है। जो अंतर्मन कहे वही सामान्य रूप से बिना टारगेट बनाएं करते जाना है। ऐसी स्थिति में वह निश्चित रूप से वह तनाव रहित जीवन अच्छी तरह से जी सकता है। वैसे जीवन की अंतिम समय तक भी कभी भी कुछ घटनायें तत्काल ऐसी घटित हो जाती है जो, अस्थायी रूप से क्षणिक, अल्प समय के लिए तनाव पैदा कर देती हैं। लेकिन समय के साथ वह तनाव भी चला जाता है। यद्यपि कुछ लोग अवश्य कह सकते हैं कि एक नागरिक अंतिम सांस तक कुछ न कुछ करने की ओर प्रयत्न शील व अग्रसर रहता है। बात कुछ हद तक सही भी है। परंतु जैसा की मैंने आपको पूर्व में बताया और यह मेरा अनुभव भी है कि 65 वर्ष की उम्र के बाद सामान्य व्यक्ति जिम्मेदारी से मुक्त हो जाने के कारण उसकी जिंदगी अतिरिक्त हो आती है, जिसे ब्याज की जिंदगी कह सकते हैं और 70 के बाद चक्रवर्ती ब्याज लग जाता है। इसलिए एक अच्छी और आदर्श स्थिति यही होगी कि इस उम्र में व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होकर आने वाली पीढ़ी के लिए कार्य करने के लिए अभी तक स्वयं द्वारा ओढ़ी गई व निभाई गई जिम्मेदारी व दायित्व को अपनी पीढ़ी को सौंप कर तनाव मुक्त हो जावें। ताकि युवा पीढ़ी को कार्य करने का ज्यादा और बेहतर अवसर मिल सके और वह अपने को और ज्यादा निपुण सिद्ध कर सके।
      अंत में तनाव का एक कारण आपका सेल्फ एक्स्पेक्टेशन है। उदाहरणार्थ आपके आपके मन में यह धारणा है कि आप अपनी पत्नी के लिए कुछ कर सकते हैं अर्थात ‘‘यू आर एक्स्पेक्टिंग टू मच’’ जो कोई नहीं कर पाया है। यह ‘आशा’ ही आपके तनाव का कारण है।
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