आखिर! ‘‘राजनीति‘‘ में (कु) ‘‘नीति‘‘ के गिरने का ‘‘क्रम’’ ‘‘कब’’ व ‘‘कहां’’ जाकर रुकेगा?

मोहम्मद रफ़ी का गाया यह ‘गीत’ ‘‘बाबुल की दुआएँ लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले’’, दिल से बाहर आकर मुह से गुनगुनाने लगा, परन्तु जिनकी जुबान पर शायद यह गीत था, परिस्थति के घटना क्रम को देखते हुए इसे अपने दिल में ही उतार लिया?। घर से निकलने के बाद भी दुनिया की किसी भी महिला से उसका बाबुल कभी नहीं छूटता। सुप्रियो से उनका ‘राजनैतिक बाबुल’ छूटना सामान्यतः हमारी समग्र राजनीति और विशेषकर भाजपा की कार्यप्रणाली का ज्वलंत उदाहरण है। 


राजीव खंडेलवाल:-

पश्चिम बंगाल के आसनसोल लोकसभा क्षेत्र के भाजपा के सांसद, पूर्व केंद्रीय मंत्री और प्रसिद्ध लोकप्रिय 12 भाषाओं के 90 के दशक से फिल्मी गीत-संगीत की दुनिया के गीतकार की सोशल मीडिया ‘‘फेसबुक‘‘ पोस्ट के माध्यम से ‘‘राजनीति‘‘ से ‘‘सन्यास’’ और लोकसभा से 1 महीने के भीतर इस्तीफे़ देने की निर्णय की अचानक जानकारी मिली। हाल में ही हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल के पुनर्गठन में उन से लिए गए इस्तीफे़ (शायद केंद्रीय मंत्री रहते हुये टॉलीगंज विधानसभा से हुई हार) के कारण अपमानित व आहत होने से और पश्चिम बंगाल भाजपा के नेतृत्व से मतभेदों के चलते भाजपा की पश्चिम बंगाल में हुयी बड़े जीत के दावों के विपरीत होने से व्यथित होकर (क्योंकि वे स्वयं को मुख्यमंत्री पद का दावेदार मानते थे) ‘‘निराशा‘‘ में बाबुल सुप्रियो ने उक्त कदम उठाया है, ऐसा प्रथम दृष्टया राजनीतिक दृष्टि से माना जा सकता है। ‘‘अशांतस्य कुतः सुखम्’’। 

तथापि सोशल मीडिया में कथन करते हुए बाबुल सुप्रियो ने यह कहा कि वह सामाजिक कार्यों (समाज सेवा) के लिए ही राजनीति में आए थे। लेकिन वे महसूस करते हैं कि बगैर राजनीति के या राजनैतिक दल के सदस्य रहे बिना भी सामाजिक कार्य व लोगो की सेवा की जा सकती हैं। इसलिए वे राजनीति को अलविदा कह रहे हैं। संसद की सदस्यता से 1 महीने के भीतर इस्तीफ़ा दे देंगे। क्योंकि वे जानते हैं कि ‘‘भेड़ जहां जायेगी, वहीं मुडेगी’’। न तो कोई दल बना रहे है और न ही किसी अन्य पार्टी में जा रहे है। विपक्षी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने तो इसे ‘ड्रामा’ करार कर दिया है। बाबुल सुप्रीयो का उक्त कथन अर्द्धसत्य है, क्योंकि राजनीति में नीति तो कापी पहले से नहीं रह गई है, इसलिए उसे छोड़ने का प्रश्न कहां पैदा होता है। जहाँ तक ‘राज’ की बात है वह भी राजसत्ता का मंत्री पद छीना जा चुका है और वे सिर्फ मात्र सांसद रह गये है। पार्टी में भी उनकी सत्ता का प्रभाव न्यूनता हो गया है। इसलिए वे सिर्फ सांसद पद ही छोड सकते है, जिसे का कार्य रूप देना बाकी है।

उपरोक्त संपूर्ण कथन अपने आप में ही ‘‘राजनीति‘‘ लिए हुए हैं और शायद इसी को ही तो ‘‘राजनीति‘‘ कहते हैं। व्यक्ति जीवन से अलविदा जरूर हो जाता है लेकिन राजनीति से पूर्ण रूप से अलविदा नहीं! क्योंकि राजनीति का मतलब सिर्फ पार्टी राजनीति ही नहीं होती है, बल्कि सामाजिक क्षेत्र में व यहाँ तक कि फिल्मी गीत-संगीत क्षेत्र में भी होती है, जहाँ से बाबुल सुप्रीयो है। राजनीति में आकर वापिस जा रहे है। जे.पी. नड्डा के सार्वजनिक रूप से सुप्रीयो से उक्त निर्णय पर पुर्नविचार की अपील के उत्तर में 2 दिन बाद बाबुल सुप्रियो की भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा से हुई मुलाकात के बाद आया उनका यह बयान कि वे अब लोकसभा से इस्तीफ़ा नहीं दे रहे हैं, लेकिन राजनीति से दूर रहेंगे, से उक्त बात बहुत कुछ सिद्ध हो जाती है। मूल पोस्ट में लिखी बात कि वे हमेशा बीजेपी के हिस्सा रहेगें, को बाद में हटा दिया। बंगाल बीजेपी के अध्यक्ष दिलीप घोष का यह कथन कि यह उनका निजी फैसला है, जो राष्ट्रीय अध्यक्ष नड्डा के स्टैंड के विरूद्ध है। आज की भारतीय राजनीति की यही ‘‘विशिष्टता‘‘ तो रह गई है।

बाबुल सुप्रियो ने अपने इस्तीफे़ के लिए दिए कारणों से राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। सामान्यतया सामाजिक और राजनीतिक कार्य व कार्यकर्त्ता अलग-अलग होते हैं, परिभाषित होते है व पहचान लिये होते हैं। परंतु यहां पर तो फिल्मी ‘‘गीत-संगीत‘‘ क्षेत्र छोड़कर ‘‘सामाजिक‘‘ कार्य करने के लिए बाबुल सुप्रीयो ‘‘राजनीति‘‘ में आए। जबकि अधिकांशतः अन्य नागरिकगण तो देश सेवा के लिये राजनीति में आने का प्रायः दावा करते है। गोया, सामाजिक कार्य करने के लिए राजनीति की सीढ़ी चढ़ना जरूरी है? इस ‘‘गलत‘‘ बात को ‘‘सही‘‘ समझने में बाबुल सुप्रियो को 7 साल लग गए। (उन्होंने वर्ष 2014 में राजनीति में भाजपा के माध्यम से पदार्पण किया था।) यह तो वही बात हुई कि शब को मय़ खूब सी पी, सुबह को तौबा कर ली, रिंद के रिंद रहे, हाथ से जन्नत न गयी।

राजनीति को ‘‘टा टा‘‘ करके संसद बने रहने का उनका पुर्ननिर्णय क्या देश की राजनीति को शायद एक ‘‘नई दिशा‘‘ नहीं देगा? उन्होंने एक और नया शिगूफा दिया, बिना राजनीति रूप से सक्रिय वे अपनी संसदीय जिम्मेदारी निर्वाह करते रहेगें। सालो राजनीति के रंग में समाहित हो जाने के बावजूद अनेक लोग अपनी संसदीय जिम्मेदारी निभा नहीं पाते है। अभी तक तो देश की लोकतंत्रीय प्रणाली की राजनीति में दलीय और निर्दलीय (बहुत कम) राजनीति का ही बोलबाला व वर्चस्व रहा है। राजनीति को ‘‘बाय बाय‘‘ कर सन्यास ले कर संसदीय राजनीति की पारी को पूर्ण करना कही राजनीति की एक ‘‘नई थ्योरी‘‘ को तो इजाद नहीं कर रहा है? ‘‘संसद सदस्य‘‘ के ‘‘सन्यासी‘‘ हो जाने पर वह दलगत राजनीति के पचड़े से दूर हो जाएगा। क्योंकि ‘‘पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं’’। व्यक्तिगत स्वार्थ या स्वार्थ भावना से परे रहकर वह सिर्फ और सिर्फ देश के लिए ही सोचेगा व तदनुसार कार्य करेगा, जिससे देश मजबूत होगा। समाज सेवा का कार्य चलते रहेगा। (जैसा कि बाबुल सुप्रीयो ने कहा है) अतः व्यक्ति से परिवार व उससे आगे बढ़ते हुये समाज और अंततः समाज से ही देश का निर्माण होता है। 

यदि देश में अपनाई गई संसदीय प्रणाली के लोकतंत्र में समस्त 795 संसद सदस्य (लोकसभा व राज्यसभा) व विधानसभा-विधान परिषद सदस्यगण भी ‘‘सन्यास की इस नई राजनीति‘‘ व संसदीय राजनीति को अपना लें तो, संसद में जो ‘‘गतिरोध‘‘ अभी चल रहा है, तो वह न केवल समाप्त हो जाएगा बल्कि भविष्य में भी ऐसा नहीं होगा? ‘‘चोर उचक्का चौधरी, कुटनी भई प्रधान’’ दलगत राजनीति के चलते देश के स्वास्थ्य व विकास पर जो विपरीत प्रभाव पढ़ रहा है, उसकी भी समाप्ति हो जाएगी और देश तेजी से विकास, समृद्धि उन्नति और खुशहाली की ओर बढ़ेगा। इसलिए इस नई सन्यास की राजनीति के सिद्धांत को अपनाकर अन्य सम्मानीयों को भी रास्ता दिखाने के लिए न केवल बाबुल सुप्रियो धन्यवाद के पात्र हैं ,बल्कि जे.पी. नड्डा को भी धन्यवाद अवश्य दिया जाना चाहिए, क्योंकि उनसे मुलाकात के बाद ही तो बाबुल सुप्रियो ने लोकसभा से अपने इस्तीफे के निर्णय को बदला तो जरूर, परंतु राजनीति से दूर बनाए रखने के पूुर्व निर्णय को बरकरार रख कर।

अंत में, मोहम्मद रफ़ी (फिल्म नीलकमल वर्ष 1968) व बाद में सोनू निगम का गाया यह ‘गीत’ ‘‘बाबुल की दुआएँ लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले’’, दिल से बाहर आकर मुह से गुनगुनाने लगा परन्तु जिनकी जुबान पर शायद यह गीत था, परिस्थति के घटना क्रम को देखते हुए इसे अपने दिल में ही उतार लिया?। घर से निकलने के बाद भी दुनिया की किसी भी महिला से उसका बाबुल कभी नहीं छूटता। सुप्रियो से उनका ‘राजनैतिक बाबुल’ छूटना सामान्यतः हमारी समग्र राजनीति और विशेषकर भाजपा की कार्यप्रणाली का ज्वलंत उदाहरण है। संभव है कि उनके हटने के असली राज (अगर कोई हैं तो) कुछ समय के बाद सामने आएं।

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