प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘‘मास्टर स्ट्रोक’’? तीनों कृषि कानून की वापसी!

                                

स्वतंत्र भारत के इतिहास में नरेंद्र मोदी शायद अभी तक के एकमात्र ऐसे प्रधानमंत्री हुए हैं, जो अचानक कड़क और राहत देने वाले निर्णय अपने साथियों को आभास हुये बिना आसानी और विनम्रता से दृढ़ता पूर्वक ले लेते हैं, फिर चाहे वह रात्रि (08 बजे नोटबंदी) या कोविड-19 के कारण लागू राष्ट्रीय लॉकडाउन की घोषणा (08 बजे) अथवा सुबह ( 09 बजे कृषि कानून की वापसी की घोषणा) का समय हो। नोटबंदी के बाद अब संसद द्वारा पारित हुये तीनों कानूनों को वापस लेने की घोषणा ऐतिहासिक होकर नरेंद्र मोदी का यह एक और मास्टर स्ट्रोक है। ‘‘ऐतिहासिक’’ इसलिये कि इस देश में शायद इसके पूर्व कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि संसद द्वारा पारित विधेयक के कानून बन जाने के बाद उसे इंप्लीमेंट (लागू) किए बिना रद्द करने की घोषणा प्रधानमंत्री द्वारा की गई हो। यद्यपि वर्ष 2015 में भूमि अधिग्रहण कानून जो संसद द्वारा पारित कानून न होकर अध्यादेश द्वारा लागू किया गया कानून था, संसद में पारित कराने के असफल प्रयास के बाद सरकार को चार बार जारी अध्यादेश को वापस लेना पड़ा था। मास्टर स्ट्रोक होने का यह कदापि मतलब नहीं है कि देश की संपूर्ण जनता एकमत से उसे स्वीकारें, समर्थन करें व ताली बजाए। कई बार परिस्थितियों का बराबर आकलन न कर पाने की स्थिति में अथवा निर्णय को लागू करने वाली तंत्र की विफलता के कारण, कई बार ऐसे होता है, जब जिस उद्देश्य के लिए, निर्णय लिये जाते है वे उक्त कारणों से पूर्णतः सफल नहीं हो पाते हैं। जब ‘‘मास्टर ब्लास्टर’’ मास्टर स्ट्रोक (छक्का) मारता है, तो जरा सी भी ताकत स्ट्रोक में कम लगने पर वह सीमा पर कैच होकर आउट हो जाता है। यही स्थिति राजनीति में प्रधानमंत्री द्वारा मारे गए मास्टर स्ट्रोक की भी है।

किसानों की सबसे प्रमुख मांग संसद द्वारा पारित तीनों कानूनों को वापस लेने के लिये लगभग एक साल (360 दिन) से चले विश्व का सबसे लम्बा अहिंसक व शांतिप्रिय किसान आंदोलन में अचानक ही आज एक सुखद मोड़ तब आया जब ‘‘गुरु’’ ‘‘प्रकाश’’ पवित्र पर्व गुरूनानक जयंती पर ’बिना किसी शर्त के या बातचीत के (जो 11वीं दौर की होने के बाद 12 जनवरी से बंद थी) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बिना किसी पूर्व सूचना के डी.डी.न्यूज (मीडिया) के माध्यम से देश के नागरिकों को संबोधित करने हुये क्षमा मांगते हुए, सच्चे मन व पवित्र हृदय से अपने स्वभाव व कार्यशैली के विपरीत, प्रशंसनीय लचीलापन दिखाते हुए, किसानों की उक्त प्रमुख मांग स्वीकार करने की घोषणा करते हुए यह कहा कि ‘‘शायद हमारी तपस्या में कुछ कमी रही होगी जिस कारण से हम कुछ किसान भाइयों को *प्रकाश* जैसा सत्य नहीं समझा पाए’’। यह कहकर प्रकाश पर्व की महत्ता को ईशारे में इंगित किया। साथ ही प्रधानमंत्री ने यद्यपि एक नई शुरुआत की उम्मीद करते हुए किसानों से अपने-अपने घर और गलियारों में लौटने की अपील की, तथापि उन्होनें इस आंदोलन में 700 से भी ज्यादा मृत व्यक्तियों व परिवारो के लिए व किसानो की एक साल के आंदोलन में झुलसे कड़क तपस्या के लिए एक शब्द भी सहानुभूति में नही कहा।

           यह विनम्रता व भावुकता ली हुयी घोषणा 56 इंच का सीने लिये, एक दृढ़, कड़क प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे व्यक्ति ही कर सकता हैं। प्रधानमंत्री द्वारा आंदोलित किसानो की सबसे महत्वपूर्ण मांग के विनम्रतापूर्वक स्वीकार करने के बाद कम से कम संघर्षशील सयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं सहित समस्त राजनैतिक नेताओं को उक्त घोषणा का पहली प्रतिक्रिया में ही स्वागत करते हुये प्रधानमंत्री को धन्यवाद जरूर देना चाहिए था। धन्यवाद के साथ यदि-परन्तु-लेकिन-किंतु लगाते हुये अन्य लम्बित मांग को पूरा करने की मांग भी की जा सकती है। परन्तु देश की वर्तमान में गलाकाट व एक दूसरे को नीचा दिखाने की राजनीति के चलते, इस शिष्टाचार को निभाने में प्रायः सभी असफल रहे। वस्तुतः इस देश का राजनीतिक वातावरण अब इतना खराब हो चुका है कि परस्पर विचारों का आदान-प्रदान का होना, बिना वैमनस्य व निम्न शब्दों के (गिरते स्तर के कारण) होना, परस्पर जीवंत सम्पर्क रखना, लगभग असंभव सा हो गया है। मौजूदा राजनैतिक पस्थितियों परस्पर अविश्वास लिये व सिर्फ स्वयं के राजनैतिक हित साधक लिये हो गयी है कि यदि आपके विरोधी राजनीतिज्ञ आपको प्लेट में चांदी की एक (वर्क) परत लगाकर मिठाई प्रस्तुत करें, तब भी आप उसे खाकर धन्यवाद देने की बजाय उस चांदी की (वर्क) परत पर शक करने लग जाते हैं कि कहीं यह नकली होकर नुकसानदायक तो नहीं है? विरोधियों द्वारा किया अच्छा कार्य के लिए पीठ थपथपाने वाला बड़ा दिल अब ढूंढो नहीं मिलता हैं। देश की प्रगति में सबसे बड़ा रोड़ा ऐसी ही कुत्सित विचारों के प्रवाह का होना है। 

सबसे दुर्भाग्यपूर्ण प्रारंभिक टिप्पणी किसान नेता राकेश टिकैत की रही जो यद्यपि ‘‘सकिम’’ अध्यक्ष नहीं हैं, (अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढ़ूनी हैं) तथापि किसान आंदोलन का सबसे प्रमुख चेहरा बने हुए हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का औपचारिक अभिवादन कर धन्यवाद दिये गये बिना कहा कि बिना बातचीत किसान वापिस घर नहीं लौंटेंगे। वे अपने पूर्व कथन (लगातार) को भूल गए कि ‘‘कानून वापसी के बाद घर वापसी होगी‘‘ लगभग एक साल (360 दिन) से चल रहे इतने बड़े किसान आंदोलन जिसमे 700 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई हो, का नेतृत्व करने वाले नेता से कदापि यह उम्मीद नहीं की जा सकती है। राकेश टिकैत का यह भी कहना रहा कि यह प्रधानमंत्री की यह मीडिया के सामने घोषणा है, संसद में नहीं। प्रधानमंत्री का सार्वजनिक रूप से किसी निर्णय की घोषणा लगभग संसद में दिए गए घोषणा के समान ही प्रभावी होकर बंधनकारी जैसी ही होती है। ऐसा कोई उदाहरण किसान नेता या विपक्षी दल नहीं बता सकते है, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक रूप से कोई कानून को बनाने की या खत्म करके या अन्य कोई कार्य करने की घोषणा की हो, जो बाद में झूठी सिद्ध हुई हो। तथापि घोषणाओं को धरातल पर उतारने में समय अवश्य लग सकता है। राकेश टिकैत आगे प्रश्न उठाते हुये कहते है कि क्या नरेंद्र मोदी संसद से ऊपर है? उनका यह अर्थहीन प्रश्न मामले को गलत दिशा में ले जाने का प्रयास मात्र है। प्रधानमंत्री निश्चित रूप से संसद से ऊपर नहीं है, लेकिन उस संसद के एक प्रमुख भाग जरूर है जिसने किसानों के हित में तीनों कानून पारित किये थे। निश्चित रूप से किसम (किसान संघर्ष समिति) को प्रधानमंत्री की इस घोषणा का फौरी तौर पर तुरंत स्वागत करना चाहिए था। जरूर वे यह कह सकते हैं कि हम संघर्ष समिति की बैठक तुरंत बुलाकर प्रधानमंत्री की घोषणा पर निर्णय लेंगे। क्योंकि इस तरह के आंदोलनों को चलाने वाली संघर्ष समितियों में संयोजक/अध्यक्ष विचार विमर्श किये बिना व सहमति के बिना किसी निर्णय की घोषणा नहीं कर सकते हैं, किसी भी आंदोलन का ये मूल तत्व होते हैं। क्योंकि एक व्यक्ति के एक गलत निर्णय से आंदोलन को हानि पहुंच सकती है।

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