माननीया‘‘ द्रौपदी मुर्मू’’ क्या भारतीयों की राष्ट्रपति बन रही है या सिर्फ ‘‘आदिवासियों’’ की?

राजीव खंडेलवाल     


महामहिम ’’द्रौपदी मुर्मू’’ के औपचारिक रूप से भारत की अगली राष्ट्रपति चुने जाने की स्थिति को देखते हुए हार्दिक अग्रिम बधाइयां। चूंकि वे देश की सर्वोच्च संवैधानिक पद ‘राष्ट्रपति’ के लिये चुनी जा रही है। अतः एक नागरिक का यह अधिकार व कर्तव्य है कि वे बधाई दे, शुभकामनाएं दे, व उनके उज्जवल भविष्य की कामना करें। ‘‘राष्ट्रपति’’ के रूप में अगले पांच सालों में वे देश का सफल नेतृत्व कर विश्व धरातल पर देश का नाम रोशन कर और ऊंचाइयों पर ले जाएं। इन्ही सब शुभकामनाओं के साथ पुनः बधाइयां।  

     देश का एक नागरिक होने के नाते मैं भी उन्हें अग्रिम बधाई देता हूं। इसलिए नहीं कि वे देश की ‘‘प्रथम आदिवासी राज्यपाल’’ होकर, अब देश की ‘‘प्रथम आदिवासी’’ राष्ट्रपति होने जा रही है। बल्कि वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समान साधारण पृष्ठभूमि से निकल कर शायद सबसे कम उम्र की होकर देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचेगी, जिसके लिए वे एक मूल भारतीय होने के नाते बधाई की पात्र है। ‘‘लाल गुदड़ी में नहीं छुपते’’ आज ही ब्रिटेन में भारत मूल के ऋषि सुनक के प्रधानमंत्री बनने की प्रबल संभावनाओं के समाचार आ रहे हैं। इससे महामहिम मुर्मू की सफलता और महत्वपूर्ण हो जाती है। यह हमारे तंत्र (जो देश को आगे गति दे रहा है।) खासकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय के मूल मंत्र अंत्योदय अर्थात आखिरी पायदान पर खड़ा व्यक्ति भी सर्वोच्च पद पर पहुंच सकता है, जिसकी भूरि-भूरि प्रशंसा अवश्य की जानी चाहिए। परन्तु पता नहीं, क्यों मेरी जागरूकता में कहां? कोई? कमी रह गई है। जिसे शायद मैं देख ही नहीं पा रहा हूं, समझ नहीं पा रहा हूं कि महामहिम द्रौपदी मुर्मू को उन्हें देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचने पर बधाई दी जा रही है अथवा आदिवासी होने के कारण बधाई दी जा रही है, ‘‘भई गति सांप छछूंदति केरी’’ के शिकार विरोधी उन पर ‘अनावश्यक’ तंज कसे जा रहे हैं या ‘‘कुएं में ही भांग पड़ी हुई है’’। हम बात समरसता की करते हैं, सर्व समाज की बात करते है, और जात-पात की निंदा भी करते है। अर्थात ‘‘सबका साथ, सबका विकास, सबका प्रयास’’ प्रधानमंत्री के बहुप्रचरित मंत्र की उक्त मूल बाते हैं। ये सब बातें सार्वजनिक व राजनीतिक जीवन की किताबों में न केवल लिखी है, बल्कि लगभग देश का प्रत्येक नागरिक या राजनीतिक पार्टी या नेता उसे शब्दशः सही मान कर पालन करने की घोषणा भी करता हैं। परंतु वास्तविकता क्या है? व्यवहार व धरातल पर वस्तुस्थिति क्या है? हम ‘‘दो नावों पर सवार हैं’’, यह हम सब से छिपी नहीं है! यही तो दोहरी मानसिकता का प्रर्दशन है। 

     अतः इसी कड़ी के रूप में शायद इस वास्तविकता को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से द्रौपदी मुर्मू को देश का प्रथम आदिवासी राष्ट्रपति बनाये जाने पर न केवल बधाई देने का सिलसिला चल रहा है, बल्कि उनके पद ग्रहण करने के बाद ‘‘हिलोरें मारते आदिवासी प्रेम’’ के कारण  देश की सत्ताधारी व विश्व की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा ने पूरे देश में लगभग 1.30 लाख आदिवासियों गांवों में जश्न बनाने की घोषणा भी कर दी है। क्या इन आदिवासी गांवों में गैर आदिवासी लोग नहीं रहते हैं? क्या महामहिम मुर्मू देश के शेष गांवों के निवासियों की राष्ट्रपति नहीं होगी? जहां जश्न मनाने की नीति की आवश्यकता पार्टी ने महसूस नहीं की? एकता, अखंडता व राष्ट्रीयता की बात करनी वाली व पहचान बनाने वाली देश की एकमात्र राजनीतिक पार्टी भाजपा का यह अचंभित कर देने वाला यह निर्णय एक गंभीर चिंता का विषय हो गया है, क्योंकि यह नई प्रथा (कस्टम/परिपाटी) का निर्माण कर भविष्य में जब कोई अन्य जाति जैसे उदाहरणार्थ मुस्लिम व्यक्ति राष्ट्र के सर्वोच्च पद पर बैठेगा, तो काउंटर (पटल) में उस समाज के लोग भी यदि इस नई परिपाटी की आड लेकर इसी तरह का निर्णय लेंगे, तब क्या होगा? (संतोष की बात यह है कि पूर्व में ऐसा करने का प्रयास नहीं हुआ) अतः देशहित में इस निर्णय पर पुर्नविचार किये जाने की महती आवश्यकता है। भविष्य के गहराते बादलों में छुपी इस चिंता पर भी विचार करना होगा। 

वैसे भाजपा के अंदरखाने की बात की जाये तो भाजपा ने मुर्मू का चुनाव आदिवासियों और देश की आधी जनसंख्या महिलाओं के बीच पेठ तथा पूर्वी भारत में पार्टी के विस्तार के लिए किया हैं। परन्तु वास्तविक रूप से जब तक आदिवासियों (अनुसूचित जनजाति) का व्यापक सम्पूर्ण समाज में विलीन होकर अस्तित्व हीन होकर समाज का अभिन्न (इंटरगल) हिस्सा नहीं बनेंगे और इस दिशा में कोई ठोस सार्थक कदम नहीं उठाएंगे तथा पिछड़ेपन के आधार पर आदिवासियों की अलग पहचान (वोटों की राजनीति के कारण) बनाये रखेंगे, तब तक उनकी समाज में समरसता व समग्र विकास संभव नहीं हो पायेगा। उनके लिए तो ‘‘को नृप होऊ हमहिं का पानी’’ वाली स्थिति ही रहेगी। यदि वास्तव में ऐसा होता तो डॉ. भीमराव अंबेडकर संविधान बनाते समय प्रारंभ में उनके विकास के लिए मात्र 10 वर्ष का आरक्षण का प्रावधान नहीं रखते। जो भी सरकार रही है, ने ‘‘अटका बनिया देय उधार’’ की तर्ज़ पर वोट की राजनीति के लिए प्रत्येक 10 वर्ष बाद आरक्षण को बढ़ाया और आगे भी कब तक? बढ़ेगा, इसकी अंतिम समय सीमा आज का कोई भी राजनीतिज्ञ बताने की स्थिति में नहीं है। 

     आखिरकार देश की लगभग 140 करोड़ से अधिक जनसंख्या में विभिन्न वर्गों के लोग शामिल है, चाहे वह अगड़ा, पिछड़ा या अति पिछड़ा वर्ग, कुलीन वर्ग निर्धन मध्यम या अमीर सब शामिल है। ’एक आम सामान्य परिस्थिति से भारत के सर्वोच्च पद पर पहुंचने के कारण महामहिम मुर्मू’ की जीत के जश्न में हम प्रत्येक भारतीय क्यों नहीं शामिल हो सकते हैं? जिस प्रकार भारत के प्रधानमंत्री चाय वाले से जीवन प्रारंभ कर देश के कार्यपालिका के सर्वोच्च पद पर पहुंचे हैं। ठीक इसी प्रकार द्रौपदी मुर्मू का जीवन भी प्रधानमंत्री के समान ही संघर्षशील रहा और वे भी ‘‘कांटों पर चल कर’’ संघर्ष करते हुए आज सर्वोच्च पद पर पहुंच रही हैं। टीचर की नौकरी के बाद क्लर्क की नौकरी करती हुई पार्षद बनकर उन्होंने अपना राजनीतिक जीवन प्रारम्भ किया।

      देश 75वां स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है। इस अमृत महोत्सव पर हम सब का यह प्राथमिक, संवैधानिक और सामाजिक दायित्व बनता है कि समाज की समरसता बनी रही, कोई वर्ण-वर्ग-विभेद न हो स्वाधीनता के अमृत वर्ष में ‘अमृत’ सब पर बरसे और हम जात-पात, क्षेत्रवाद (उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम) से ऊपर उठकर सिर्फ और सिर्फ सच्चे अर्थों में एक वर्ग-विभेदहीन भारतीय बने। 75 साल में यदि हम एक सम्पूर्ण समरसता युक्त भारतीय नहीं बन पाये हैं और न बना ही पाए हैं, तो हम देश के किस विकास? की बात करना चाह रहे है। जो कुछ विकास हुआ है, वह भारत देश का है या भारतीयों का है अथवा समाज के विभिन्न नामों व वर्गों से जाने वाले लोगों का है? यह तो ‘‘आधा तीतर आधा बटेर’’ वाली पहेली है। यदि एक पिछड़े समाज के व्यक्ति के उच्चतम पद पर पहुंच जाने पर उस समाज का अवरूद्ध विकास ‘विकासशील’ या ‘विकसित’ हो जाता तब तो यह तर्क उचित लगता। परन्तु क्या धरातल पर वास्तव में ऐसा हुआ है? वास्तविक सत्ता का सर्वोच्च पद अर्थात ‘‘प्रधानमंत्री’’ पर उक्त तर्क कभी लागू कर धरातल पर उतारा जायेगा? क्योंकि राष्ट्रपति व राज्यपाल जो संविधानिक होकर व वास्तविक अर्थो के व्यवहार में मात्र शोभा का पद है, जिन पर ही वर्ग विशेष का महत्ता बताकर निर्वाचित नियुक्ति पूर्व से लेकर आज तक की जाती रही हैं। 

     अभी अनुसूचित जाति के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद निवर्तमान हो रहे है। पूर्व में भी हमारे देश में मुस्लिम समाज के राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन, फखरुद्दीन अली अहमद, डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम आजाद हुए तथा हामिद अंसारी उपराष्ट्रपति हुए। क्या सरकार या किसी एजेंसी के पास ऐसा कोई आंकड़ा है कि इन पांच सालों से अनुसूचित जाति से राष्ट्रपति होने के कारण पिछले पांच सालों की तुलना में ‘‘दलितों की काया पलट गयी’’ या किसी भी क्षेत्र में उक्त समाज का ज्यादा विकास हुआ है? सरकार को इन आंकड़ों को जनता के बीच में लाना चाहिए। अन्यथा ये कथन/बयान/नारे ‘‘बालू की भीत’’ के समान सिर्फ वोटों की राजनीति के तहत ही माने जायेगें। कोई भी पार्टी ‘‘दूध की धुली’’ नहीं है। इस ‘‘राजनीतिक हमाम में सब नंगे’’ है। यह एक तथ्य जनता के बीच में स्वीकृति के साथ सर्वानुमति से मान्य है। परंतु देशहित में कभी-कभी सर्वसम्मति नुकसानदायक होती है। इसलिए जिस दिन इस मुद्दे पर असहमति के बीज पैदा हो जायेगें, उस दिन से वोट की यह राजनीति भी कमजोर पड़ती जाएगी, तब शायद देश स्वस्थ होकर मजबूती की ओर बढ़ेगा।

अंत में प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान के आज के बयान की भी चर्चा कर ले! उन्होंने महामहिम के ‘‘जनजाति’’ वर्ग से होने के कारण सिर्फ वोटरों में ही नहीं बल्कि व्यापक रूप से खुशी जाहिर होने की बात कही है। इन आदिवासियों के लिए बनी योजनाओं में 31 परियोजना 2015-16 से लगभग बंद की स्थिति में है। वर्ष 2015 से अभी तक अजजा के विकास के लिए मिले 5 हजार करोड़ रू. का बजट लैप्स हो चुका है। जनजाति के शासकीय विभाग के लगभग 30 हजार बैकलाॅग खाली पदों को यदि भर दिया जाता व केन्द्र सरकार के आदिवासियों के हितों के लिए आये 500 करोड़ रू. खर्च कर दिये जाते तो यह ‘‘खुशी’’ दोगुनी होकर ‘‘सोने पे सुहागा’’ हो जाती और चार चाँद लग जाते। शायद उक्त तथ्य उनके ध्यान में नहीं आया।

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