‘समान नागरिक संहिता’’(यूसीसी)! कितना सही! धरातल पर वास्तविकता में कितना उतर जाएगी? ‘‘मसौदा’’ (प्रारूप) सार्वजनिक कर सुझाव मांगे जाये!


पहल व कानून बनाए जाने का समर्थन!

 राजीव खंडेलवाल 

परिवर्तन प्रकृति का नियम है, ‘‘जड़ता’’ नहीं। ठीक इसी प्रकार कानून भी जड़ता लिए न होकर परिवर्तनशील होकर आवश्यकतानुसार इनमें समय-समय पर संशोधन व नये कानून बनाये जाते रहे हैं। जैसी कि एक फारसी कहावत है कि ‘‘हरचे आमद इमारतों नो साख्त’’। जिसका अर्थ है :- जो आया, उसने एक नयी इमारत तामीर की। इस दृष्टि से, और संविधान के भाग 4 के अनुच्छेद 44 के अन्तर्गत दिये गये नीति निर्देश सिद्धांत के अपेक्षित अनुपालन में तथा उच्चतम न्यायालय द्वारा वर्ष 1985 में शाहबानो प्रकरण व तत्पश्चात कई बार वर्ष 1995, 1997, 2014 में यूसीसी की संहिता बनाये जाने के निर्देश दिये गये। तदनुसार यूनिफॉर्म सिविल संहिता बनाये जाने की गंभीर, दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ भारतीय जनता पार्टी की सरकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में जहमत उठा रही है। इसके परिपालन में 22वें भारतीय विधि आयोग (लॉ कमीशन) जो संवैधानिक या वैधानिक निकाय न होकर भारत सरकार के आदेश से गठित एक कार्यकारी निकाय है, ने 14 मई को एक पत्र सार्वजनिक कर संपूर्ण देश के लिए एक ‘‘समान सिविल संहिता’’ (यूसीसी) कानून बनाए जाने के लिए एक महीने के अंदर आम नागरिकों से सुझाव मांगे हैं। निश्चित रूप से इस पहल का व अंततः इसे कानूनी रूप दिये जाने की दिशा में बढ़ाए गए कदम का *समर्थन* किया ही जाना चाहिए, क्योंकि ‘‘सबके लिए समान कानून’’ ही ‘‘देश की एकता’’ "समरसता" व "मानवोचित कानून" का आधार है। एकता में ही शक्ति है, जैसी कि उक्ति है कि ‘‘संघे शक्तिः कलौयुगे’’! वर्ष 2022 में भाजपा सांसद किरोड़ी लाल मीणा ने राज्य सभा में इस संबंध में एक निजी विधेयक भी प्रस्तुत किया था। 

कॉमन व यूनिफॉर्म सिविल कोड में ‘‘अंतर’’। 

           परंतु समर्थन के पहले यह जानना आवश्यक है कि आम जन मानस के बीच पूर्व में समान (कॉमन) नागरिक संहिता की बात चर्चा में रही थी, जो अब ‘‘यूनिफॉर्म नागरिक संहिता’’ में बदल गई है। ‘कॉमन’ व ‘यूनिफॉर्म’ शब्द सतही तौर पर एक समान से ही लगते है। तथापि दोनों में अंतर बहुत है। इसलिए समर्थन/विरोध के पूर्व इसको समझना भी आवश्यक है। कॉमन (समान) शब्द का अर्थ है ‘‘ सभी परिस्थितियों में एक समान’’।जबकि यूनिफार्म (एक समान) का अर्थ है ‘‘ समान परिस्थितियों में समान’ ’। मतलब अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग कानून हो सकते है। परंतु किसी विशेष समूह के भीतर कानून एक समान होना चाहिए। कॉमन सिविल कोड का मतलब यह है कि यह बिना किसी वर्गीकरण किये संपूर्ण भारत क्षेत्र के समस्त नागरिकों पर कानून लागू होगा, जैसे सामान्यतया क्रिमिनल लॉ होते हैं, जिन्हें हम ‘‘लॉ-इन-रेम’’ कहते हैं। ‘यूसीसी’ जहां विभिन्न वर्गों को वर्गीकृत करके भी विभिन्न वर्गो के लिए अलग-अलग परन्तु समस्त देश के लिए एक कानून बनाए जा सकते है, जो सिविल या पर्सनल लॉ कहलाये जाते हैं। ये प्रभाव में ‘‘लॉ-इन-परसोनम’’ होते है। जैसे अनुबंध कानून, संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, भागीदारी अधिनियम आदि सिविल कानून है, जो यूसीसी का एक ही भाग है। भारतीय जनता पार्टी की मूल विचारधारा (जनसंघ से लेकर) एक राष्ट्र एक संविधान, एक नागरिकता, एक प्रधानमंत्री, एक झंडा, एक राष्ट्रीय शिक्षा नीति, एक टैक्स (कर), एक राशन की दिशा कि और चलने का यह एक महत्वपूर्ण *कदमताल* है, जिसे भाजपा हर चुनावी घोषणा पत्र में शामिल करती चली आ रही है। ‘‘कर ले सो काज भज ले सो राम’’ की तर्ज पर निपटाना चाह रही है। 

अब यह संहिता (कोड) ‘‘व्यापकता’’ से हटकर ‘‘सीमित’’ होकर यूसीसी के रूप में लाई जा रही है। जो एक राष्ट्र-एक नागरिकता के समान, समस्त नागरिकों पर समान रूप से लागू नहीं होने जा रही है, ऐसा प्रतीत होता है। यहां इस बात को भी ध्यान में रखने की आवश्यकता है कि हमारा देश कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक विविधता में एकता व एकता में अनेकता लिये हुए बहुधार्मिक आस्थाओं मान्यताओं का देश है, जहां यूसीसी से देश की इस पहचान व स्वरूप पर कहीं कोई आंच नष्ट होने की सीमा तक, तो नहीं पहुंचेगी? अतः अंततः सरकार या विधि आयोग यूसीसी के अंतर्गत ‘‘क्या’’ करने जा रहा है, उसे स्पष्ट किया जाना अत्यंत आवश्यक हो गया है। क्योंकि ‘‘कुलिया में गुड़ नहीं फोड़ा जा सकता’’। 

आखिर ‘‘यूसीसी है क्या?’’

           प्रथम प्रश्न तो यही है, क्या यूसीसी कोई ‘‘कानून अथवा संहिता है’’ जिस पर भारतीय विधि आयोग ने 14 जून को एक सार्वजनिक पत्र (पब्लिक नोटिस) जारी कर ‘‘समान नागरिक संहिता’’ पर मान्यता प्राप्त धार्मिक संगठनों सहित आम नागरिकों से सुझाव मांगे हैं? उत्तर ‘‘नहीं’’। हां! अवश्य इस बात का उल्लेख संविधान के ‘‘भाग 4 के अनुच्छेद 44’’ में मिलता है, जिसके अनुसार ‘‘राज्य संपूर्ण भारत में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता को सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा’’। चूंकि यह तथ्य संविधान में ‘‘नीति निदेशक’’ सिद्धांत के रूप में शामिल है, मूल अधिकार के रूप में नहीं (जो संविधान सभा में तत्समय एक वोट से चूक गया), अतः ‘‘बंधनकारी नहीं है’’। 

समान नागरिक संहिता का अर्थ है देश के सभी वर्गों के साथ धर्म, पंथ, लिंग पर आधारित व्यक्ति राष्ट्रीय नागरिक संहिता के अनुसार समान व्यवहार किया जायेगा और यह सभी पर समान रूप से लागू होगा। 

              तब फिर ‘‘यूसीसी अभी तक संविधान द्वारा समर्थित एक विचार मात्र है, कानून नहीं’’। इस विचार में देश के समस्त पंथों, धर्मों को मानने वाले नागरिकों पर विवाह, तलाक, भरण पोषण, संपत्ति, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण (एडॉप्शन), गार्जियनशिप (अभिभावकता) विषयों पर एक ही कानून लागू होगा। इसे कानूनी अमला पहनाए जाने के लिए ही अभी जो मशक्कत की जा रही है, उसका ही यह परिणाम है, भारतीय विधि आयोग की ‘‘दूसरी बार इस संबंध में पहल’’ व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भोपाल में सार्वजनिक रूप से मंच से प्रश्न एक परिवार दो कानून से क्या घर चल पाएगा? कर समान नागरिक संहिता को लागू करने स्पष्ट रूप से संकेत देना है। आगामी 17 जुलाई से प्रारंभ होने जा रहे मानसून संसद सत्र में शायद समान नागरिक संहिता बिल प्रस्तुत किए जाने की संभावना आशा/आशंका है।

जनता से सुझाव मांगने के पूर्व प्रस्तावित कानून का प्रारूप (मसौदा) जरूरी!

      विधि आयोग द्वारा जो कानून प्रस्तावित किया जाएगा, जब तक उसका प्रारूप सार्वजनिक नहीं किया जायेगा, तब तक आम नागरिक ही नहीं *विशेषज्ञ* भी यूसीसी पर अपने विचार सुझाव ‘‘किस सीमा’’ तक ‘‘कैसे’’ दे सकते है? पता तो चले कि ‘‘ऊंट किस करवट बैठेगा’’। क्योंकि यह विषय इतना विहंगम व विस्तृत है कि इस पर एक *मोटी किताब* लिखी जा सकती है। जब तक आयोग यह नहीं बतलायेगा कि प्रस्तावित कानून द्वारा किन पंथो, धर्मों और वर्गो के संबंध में किन विषयों विवाह, तलाक, संपत्ति इत्यादि के संबंध में यह सब प्रावधान लाये जा रहे है, तब तक किसी व्यक्ति के लिए यह कैसे संभव है कि वह कैसे सुझाव दे तो किस बात के लिए। जबकि न्यायमूर्ति चौहान की अध्यक्षता में 21वां विधि आयोग ने (वर्ष 2018) में अपनी रिपोर्ट में यह स्पष्ट मत दिया था कि तत्समय यूसीसी की न तो जरूरत है और न ही वांछनीय है। रिपोर्ट में चार वर्ष से अधिक समय व्यतीत हो जाने के कारण विषय की महत्ता प्रासंगिकता तथा अदालती आदेशों के कारण उत्पन्न 22वें विधि आयोग जिसका कार्यकाल 20 अगस्त 2024 तक बढ़ा दिया है, न्यायमूर्ति अवस्थी की अध्यक्षता में अब नये सिरे से पुनः सुझाव मांगे गए हैं। आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने हाल में ही यह कहा है कि जब *आदिवासियों* को यूसीसी के अंतर्गत नहीं लाया जा रहा है, तब फिर मुस्लिमों को क्यों? जबकि विधि आयोग ने ऐसे विचार कभी व्यक्त नहीं किए। यद्यपि अनुच्छेद 371 के कारण सुशील मोदी ने 13 करोड़ आदिवासियों को बाहर रखने की बात जरूर कही है। इस प्रकार इस तरह से बनाये जा रहे ‘‘परसेप्शन’’ को दूर रखने के लिए व नियत मुद्दों पर राय मांगने पर ही प्रयास सार्थक सिद्ध होगा। विधि आयोग ने जब यूसीसी पर सुझाव मांगे थे, तब 16 प्रश्न के द्वारा हा/न (पांच को छोड़कर) मत मांगे गये थे। इससे कुछ तो यह ज्ञात हो रहा था कि विधि आयोग किस दिशा की ओर जायेगा। जनता से यूसीसी पर सुझाव मांगे गये है। परन्तु उसका मसौदा नहीं दिया गया है। चूंकि गुणवत्ता के आधार पर यूसीसी को देखने, पढ़ने का अवसर ही उत्पन्न नहीं किया गया है, तब इसमें सुझाव किस बात का? अब जनता खुद अपने दिमाग, मन में एक प्रस्तावित कानून का प्रारूप बना ले और फिर तदनुसार उनके सुझाव के रूप में दे। यह तो वही बात हुई कि ‘‘कबीरा आप ठगाइये, और न ठगिये कोय’’। आयोग शायद जनता की यूसीसी बनाने में वास्तविक भागीदारी नहीं चाह रही है?

             अतः सरकार तुरंत पहले प्रारूप तैयार कर जारी करे और तब उस प्रारूप पर सुझाव लिये जाते तो इससे सरकार को सबसे बड़ा फायदा यह होता कि इसके आधार पर जब बिल संसद में कानून बनाने के लिए पेश किया जायेगा तो विरोध पक्ष को *बोठल* करने में सरकार ज्यादा सक्षम होगी। तब उसके पास बिल की प्रत्येक धारा के संबंध में जनता के समर्थन के आंकड़े होंगे। तभी जनता को भी यह ज्ञात होगा कि सरकार जो कानून बनाने जा रही है, उसमें कौन से हित छोड़ दिये है और कौन से हित जोड़ना आवश्यक है और कौन से हित गलत जोड़ दिये है, उसे हटाना आवश्यक है। यह भी ध्यान में रखना जरूरी है कि ‘‘कानून ऐसे हैं जिन पर सुचारू रूप से अमल किया जा सके’’

अंत में हां जब भी यूसीसी की बात उठती है, तब देश में बहुसंख्यकों व अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों के बीच एक दरार की लकीर खींचने का प्रयास किया जाता है, जो वास्तविकता में सही नहीं है। यह तथ्यों से आंख मूंदने वाली बात है। इसका विस्तृत अध्ययन हम अगले लेख में करेगें।

           हां विधि आयोग द्वारा पूर्व में इस तरह के दो प्रयास किए जा चुके हैं। विधि आयोग या सरकार ने यह तो तय कर लिया है कि राष्ट्रीय खेल हॉकी जहां कोई विकल्प नहीं है, इसलिए वह "सीसीसी" है, की जगह अंग्रेजी खेल क्रिकेट खेलना है, जहां कई विकल्प है, यह वह "यूसीसी" है। परंतु वह अभी तक यह तय ही नहीं कर पाई है कि क्रिकेट का कौन सा प्रारूप खेलना है? टेस्ट मैच, वनडे टी20 या फिर कोई नया प्रारूप टी10 तब यह कहना क्या उचित नहीं होगा "अभी तो सूत न कपास,जुलाहों में लठ्ठम लठ्ठा है"!

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