आखिर राजनीति का यह ‘‘कीचड़’’ किस निम्नतर सीमा पर जाकर रूकेगा?

 ‘‘राज’’-‘‘नीति’’ का ‘‘दलबदल’’ ‘‘दलबल’’ ‘‘राज दंड’



अभी तक राजनीति में किसी राजनेता को सफलता प्राप्त करने के लिए मैं अंग्रेजी के ‘ *एम* ’ अक्षर से शुरू होने वाले चार शब्दों अर्थात *चार एम* जरूरी मानता रहा हूं। ये चार एम हैः- ‘‘मनी’’ पावर, ‘‘मसल’’ पावर, ‘‘माब’’ पावर एवं ‘‘मीडिया’’ पावर ‘‘विद परिक्रमा, विदाउट पराक्रम’’। मेरे राजनीतिक जीवन के अनुभव के आधार पर मेरी उक्त धारणा/व्याख्या बनी है, जो वर्तमान की वास्तविक धरातल पर समस्त/विभिन्न पृष्ठभूमि के नेताओं पर आज भी उतनी ही लागू होती है, जो "चक्की में से भी साबुत निकल आवे"। परंतु महाराष्ट्र में अभी जिस तेजी से राजनीतिक घटनाक्रम बदले हैं, और चल रहे है, उक्त घटना ने व इसके पूर्व शिवसेना में हुई टूट की घटना से मुझे उक्त चार एम के साथ एक ओर ‘एम’ किसी भी राजनीतिक पार्टी को वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों के मुद्दे नजर लोकतंत्र की राजनीति में सत्ता प्राप्ति की सफलता के लिए जोड़ना आवश्यक हो गया है, और वह एम है ‘‘मशीनरी’’ पावर! (सीबीआई, ईडी इत्यादि केंद्रीय एजेंसीज्)

        उक्त *गुण* जो *अवगुण* नहीं, राजनीति में आने की इच्छा रखने वाले जिस व्यक्ति में होंगे, वही व्यक्ति के राजनीति में सफल होने की संभावना की सूची में आ पाएगे और "वीर भोग्या वसुंधरा" की उक्ति को साकार करने में समर्थ होंगे। अन्यथा उसे राजनीति में आने की अपनी इच्छाएं को उत्पन्न होते ही मार देनी चाहिए, बल्कि उत्पन्न होने ही नहीं देना चाहिए, जैसे कि यदि मुस्कान आपके स्वभाव में नहीं तो वैसा के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। हां राजनीति में अपवाद हर जगह होते हैं। समस्त राजनीतिक पार्टियों के करोड़ों सदस्यों के बीच मात्र उंगलियों में गिनने वाले लोग ही आपको मिल पाएंगे, जो ‘‘उक्त गुणों’’ के बिना राजनीति में अपने सब कर्मों कर्तव्यों के पालन करने के कारण सफल हो पाए है। या हो पाएंगे? लेकिन यहां भी दुर्भाग्यवश देश की राजनीति का हाल यही रहा है कि ऐसे उंगलियों पर गिरने वाले व्यक्तियों के नाम को जनता को तो छोडि़ए, "चंदन धोई माछली, पर ना छूटे गंध" वाली राजनीति में सक्रिय लोगों को भी मालूम नहीं हो होंगे। हां शायद उनका नाम ढूंढने के लिए आपको गूगल सर्च करना पड़ सकता है। 

          कहां जाता है, राजनीति में साम-दाम-दंड-भेद सब जायज होता है। तब फिर आप उपरोक्त *पांच एम* को इसका आवश्यक अनिवार्य भाग मान ही कर अपना लीजिये। आपकी राजनीतिक जीवन की (बिना विचारधारा) के यही सफलता की कुंजी है। कुंजी इसलिए कि जिस प्रकार स्कूलों में बच्चे पाठ्यक्रम से ज्यादा कुंजियों पर सफलता प्राप्ति करने के लिए विश्वास करते है। उसी प्रकार राजनीति में भी लिखित पाठ्य (संविधान) से ज्यादा अलिखित परिपाटी सफलता के रास्ते की कुंजी है।

       याद कीजिए हरियाणा की भजनलाल की पूरी की पूरी सरकार ही लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रिया के तप से गुजरे बिना ही सत्ता के पारस पत्थर के स्पर्श से तप की चमक लिए उत्पन्न होकर तत्समय ‘‘आयाराम-गयाराम’’ की चल रही प्रक्रिया से नव गठित मुहावरे को बड़ी मजबूती प्रदान की। इसके बाद तो शर्म-हाय की झिझक खत्म ही हो गई, क्योंकि "तकल्लुफ में ही तकलीफ सरासर"। मूछों पर ताव देकर, व जिनकी मूछे नहीं है, वे भाव भंगिमाओं को आकृति देकर, ताल ठोकर, जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ सरकार बनाने से लेकर गोवा, कर्नाटक, मध्य-प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर आदि प्रदेशों में और हाल में ही मेघालय में मात्र दो सीट जीतने के बावजूद जेल भिजवाने की चेतावनी देने वालों के साथ सरकार बनाने का अंतहीन सिलसिला चल पड़ा है। शायद ऐसी ही "चक्की को चलते देख कबीरा रो पड़ा होगा"। 1967 में संविद सरकारों के दौर की तुलना में वर्तमान कांग्रेस मूकदर्शक या भुगतयमान की स्थिति में ही है। अन्यथा अवसर मिलने पर वह दो कदम आगे जाने में नहीं चूकेगी। 

           राजनीति की इस पनपती चलती नई गाथा प्रथा को संविधान में शामिल कर उसे संवैधानिक कृत्य क्यों नहीं बनाया दिया जाता है? वैसे भी राजनैतिक दल या व्यक्ति इन कृत्यों को उचित ठहराते समय संविधान का ही तो सहारा लेते हैं। क्योंकि संविधान की उक्त *कमी* ही उन्हें यह सिम्बल (आधार) प्रदान करती है।

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