लल्लू पुराण-2 "पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं।" -राजकमल पांडे 'आजाद'

राजनीति एक ऐसा लाइलाज मर्ज जो किसी को लग न जाए। वैसे तो किसी को लगता नहीं पर जिसे लग जाए, तो वो फिर अपने साथ साथ गदहे, बिल्ली और कुत्तों को भी नेता बनाने की जुगत करता है। राजनीतिक कार्य जन के उद्धार हेतु किया जाता है, पर हमारे कस्बानुमां शहर में राजनीति ख़ुद की तिजोरी भरने को, भोले भाले लोगो डराने को, जनता को हड़काने को, ख़ुद का सिक्का चलाने को और जेब कतरों व लम्पट-असामाजिक लोगों बढ़ावा देने के लिए किया जाता है। पैसे फेंको नेता बनो 10 रुपिए में अध्यक्ष बनो और 5 रुपिए में उपाध्यक्ष। और अब तो इस शहर की राजनीति इस स्तर तक उतर आया है कि "पहले कपड़े उतारते हैं फिर सॉल व श्रीफल तथा साड़ियां बांटते हैं। और जैसे जैसे चुनाव की तारीख़ नजदीक आए तो अद्धा, पउआ में उतर आएँगे। येन, केन, प्रकारेण चुनाव जीतो। ख़ुद या अपना अध्यक्ष हो ताकि अपने मन मुताबिक लल्लूराम शहर को चलाएं आपकी मर्जी हो, चाहे ना हो पर लल्लूराम की बात काटना, आफ़त मोड़ लेने जैसा है।"माँ-बाप अपने बच्चों का नाम बचपन की आदतों के अनुरूप रखते हैं, होशियार हुआ तो चेतन भगत और इन्हा-उन्हा हुआ तो लल्लूराम। देश की राजनीति में लल्लूरामों की कमी नही है, और ऐसे ही एक लल्लूराम हमारे शहर की राजनीति में 30 साल से दम भर रहे हैं। कहाँ भर रहे हैं मालूम नही, पर लल्लूराम के पिछलग्गूओं को लगता है कि हमारे लल्लूराम दम भर रहे हैं, और बहुत बड़े नेता हैं। और इतने बड़े नेता हैं कि प्रदेश की मंत्रिमंडल का विस्तार भी उनसे पूछ कर किया जाता है। दरअसल लल्लूराम ऐसे नेता हैं, जो अपने ही साथियों को धोखा देने में माहिर हैं। ऐसा कोई व्यक्ति नही जिसे उन्होंने ठगा नही, अपनी इसी आदतों के वजह से लल्लूराम राजनीति से खदेड़े गए हैं। पर वरिष्ठ हैं, सबको अपने अपने कोटे का खाने हेतु विभाग मिल गया है और लल्लूराम का मन लिजलिजा न हो इसलिए उन्हें फसल की तकवारी का जिम्मा सौंप कर खाद्य मंत्री भोपालताल मलाई चाटने चले गए। पूछ परख कुछ बची नही इसलिए लोगों को रास्ता बन्द करवाने में, भूमियों पर अवैध कब्जा व अधिग्रहण करवाने में सक्रिय हैं। ताकि शहर की जनता खबरदार रहे कि मिस्टर लल्लूराम राजनीति में सक्रिय हो गए हैं। शहर में लड़ाई, दंगा, मारपीट जैसी नौबत कभी भी उत्पन्न हो सकती है क्योंकि लल्लूराम 1985 के पूर्वाद्ध की राजनीतिक जागरूकता पर सवार हैं।

लल्लूराम घर से विषय लेकर चलते हैं। और कोई भी अगर उन्हें रास्ते में मिल जाए तो उन्हें बताते हैं कि "आज का विषय यह है।" सुनो तुम क्या हो, हम तो विद्वान को तिनके के बराबर तौलते हैं। विद्वान किसी विषय पर घण्टे भर बोलते है हम तो बिना विषय के दिन भर बोलते हैं। जहां जरूरत ना हो हम वहां भी बोलते हैं, अपने आदतन रूढ़िवादी टांग को अड़ाते ही हैं, हम ऐसे ही हैं क्योंकि हम लल्लूराम हैं। बकौल दुष्यंत कुमार के कि

"मस्लहत-आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम 

तू न समझेगा सियासत तू अभी नादान है" 

अथश्री लल्लू पुराण कथा-2 समाप्त:

क्रमशः

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